शुद्ध जाति

भगवान् का अवतार जाति व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था की रक्षा के लिये होता है ,

क्योंकि उसी में समस्त विश्व का लौकिक सुख और आत्मकल्याण है ।

-श्री आद्य शंकराचार्य ।


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#जाति_व्यवस्था -

मनुष्य की पहचान, उसकी चार प्रधान जातियॉ हैं -


१.ब्राह्मण (ये ब्राह्मण माता व ब्राह्मण पिता की सन्तान होती है )

२.क्षत्रिय (ये क्षत्रिय माता व क्षत्रिय पिता की सन्तान होती है )

३.वैश्य (ये वैश्य माता व वैश्य पिता की सन्तान होती है )

४.शूद्र (ये शूद्र माता व शूद्र पिता की सन्तान होती है )

इन चार जातियों के परस्पर सम्मिश्रण से अनुलोम व प्रतिलोम जातियॉ प्रकट होती हैं ।


इस संसार में मुख्यतः दो प्रकार के मानव हैं -

एक वो जो अपनी उपर्युक्त मूल पहचान खो चुके हैं ।

एक वो जो अपनी उपर्युक्त मूल पहचान के साथ प्रसिद्ध हैं ।

#आश्रम_व्यवस्था -
मनुष्य को अपने अनुरूप शास्त्रीय मर्यादा में इन चार आश्रमों का पालन करना है -

१.ब्रह्मचर्य आश्रम (१-२५ वर्ष अनुमानित )

२. गृहस्थ आश्रम (२५-५० वर्ष अनुमानित)

३. वानप्रस्थ आश्रम (५०-७५ वर्ष अनुमानित)

४.संन्यास आश्रम (५०- १०० वर्ष अनुमानित )

यही है सनातन वैदिक हिन्दू धर्म , यही है आर्य सभ्यता , यही है ईश्वरीय प्रशासन , यही है आर्ष परम्परा , यही है मानव सभ्यता ।।