अथ कंडोलब्राह्मणोत्पत्तिप्रकरणम् ( ४ )

ब्राह्मणादीनवदनाःकण्वं च शरणं ययुः। दुःखं विज्ञापयामासुस्ततःकण्वोऽब्रवीद्वचः ॥ २८ ॥

तस्य भूपस्य यवृत्तं तन्मे ज्ञातं मुनीश्वराः। तत्करिष्ये यथा विश्वं पाति धर्मेण पार्थिवः ॥२९॥

इत्युक्त्वा गालवं शिष्यमाहूयेदमुवाच ह ॥ गच्छ गालव राजानं मयोक्तं त्वं वदेति तम् ।।३०।।

किमधर्मरतो राजन्नात्मानं स्मर सांप्रतम् ॥ गत्वाथ गालवस्त वै बोधयामास शास्त्रतः ।। ३१ ।।

गालवस्य वचः श्रुत्वा मांधाता स नृपोत्तमः चतुरंगचमूयुक्तो गालवेनसमन्वितः ।।३२।।

ततः सौराष्ट्रमध्यस्थं पांचालं देशमाययौ। कण्वा श्रमं ततो गत्वा साष्टांग प्रणनाम: ।।३३।।

कृतांजलिपुट कण्वो मांधातारमुवाच ह ।। कुशलं ते महाराज कच्चित्पासि प्रजाः परम् ।।३४ ।।

न्यायेनभागमादाय ताभ्योयजस्वचा ध्वरान् । वह्निदानप्रभावेण प्राप्तं राज्यमिदंत्वया।। ।। ३५ ।।

स्मरसिप्राक्तनंजन्मयस्मात्सुखमवाप्स्यसि। एतन्निशम्य नृपतिः प्रोवाच विनयान्वितः ॥३६॥

मुनयः किं मया नाप्तं प्रसादाद्भवतामिह ॥ न वाडवसमं किंचित्कामिकं तीर्थमस्ति वै ।।३७।।



उस बखत ब्राह्मण दीनवदन करके कण्वऋषिके शरण आये । दुःख कहनेलगे तब कण्व बोले ॥ २८ ॥

उस राजाका वृत्तांत हमने जानलिया राजा धर्मसे जगतका पालन करे वैसा करता हूं ॥ २ ९ ॥

ऐसा कहके गालव शिष्यो को बुलाके कहने लगे हे गालव ! मांधाताके पास जा के मेरा वचन कहो कि ॥ ३० ॥

हे राजन् ! अधर्मी कैसा भया, अपने आत्मस्वरूपका स्मरण कर, तब गालव ऋषि राजाके पास जा के शास्त्रमार्ग से बोध कराने लगे ॥ ३१ ॥

मांधाता गालवका वचन सुनके चतुरांगणी सेना और गालव को साथ लेके ॥ ३२ ॥

सौराष्ट्रदेशांतर्गत पांचाल देशमें बडवाणगांव से वायु कोण में बारहकोसके ऊपरस्थान कंडोल स्थान जिसकूं हालमें कहते हैं उस कण्वाश्रम में आके हाथ जोडके साष्टांग नमस्कार किया ॥३३ ॥

तब कण्वऋषि मांधातां को कहनेलगे हे राजा तेरा कुशल तो है शास्त्ररीति से प्रजाका पालन कर ॥ ३४ ॥

और न्यायसे प्रजाका कररूपी धन लेके उस धनसे यज्ञकर, पूर्वजन्मांतर में एक अग्निदान करनेसे आज तुजको राज्य प्राप्त हुआ है ॥ ३५ ॥

पूर्व जन्मका स्मरण कर ,जिससे सुख पावेगा । ऐसा सुनते राजा नम्रतासे कहनेलेगा ॥ ३६॥

हे मुनियो ! आपके अनुग्रह से मेरे को क्या प्राप्त नहीं भया? किंतु सर्व प्राप्त हुआ है । ब्राह्मणसरीखा दूसरा किंचित तीर्थ नहीं है ॥ ३७॥


क्रमशः ( संकलन - हर्ष अध्वर्यु )