यज्ञोपवीतम्
षोडशसंस्काराः (यज्ञोपवीतम्) खंड ११०~ हिन्दूजातिका सनातन इतिहास "शिखा" और "सूत्र" का इतिहास हैं | सभ्यताके संघर्षकालमें हिन्दूजाति और संस्कृति इन्हीं पावन प्रतीकोंके साथ पली-बढी | विधर्मियोंने सर्वदा अपने आक्रमणोंका लक्ष्य शिखा-सूत्रको ही बनाया; किंतु प्राणोंका भी उत्सर्ग कर हिन्दूजातिने इसे नहीं छोडा़ और दृढतासे बचाये रखा |
यज्ञोपवीतसंस्कार षोडशसंस्कारके अन्तर्गत दशवाँ संस्कार हैं और वेदोक्त वर्णाश्रमव्यवस्था और वैदिक सनातनधर्म की आधारशिला हैं | वेद विश्वका अति प्राचिन एवं आत्मविषयक गूढ़ रहस्योंसे भरा अपौरुषेय ग्रन्थ हैं | महातपा ऋषियोंने अपने पवित्रतम हृदयमें वेदमन्त्रोंका दर्शन किया था | अतः वे मन्त्रदृष्टा ऋषि हुए" ऋषयो मन्त्रदृष्टारः"| वेदोंमें वर्णाश्रम स्पष्टरूपमें वर्णित है | पुरुषसूक्तमें चार वर्ण- ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्रकी उत्पत्ति विराट् पुरुषके विभिन्न अङ्गोसे होनेका उल्लेख हैं | वेदाध्ययन करने के लिए उपनयन अनिवार्य है । उपनयन किसका वेदसम्मत है? –यह निर्णीत होते ही वेदाध्ययन के अधिकारी का भी निर्णय हो जायेगा । वेदाध्ययनविधायक वाक्य है"स्वाध्यायोऽध्येतव्यः||तैत्तिरीय आरण्यक –२/१५|| "स्वाध्याय –स्वश्चासौ अध्यायः ,स्वस्य अध्यायः"–इस प्रकार कर्मधारय या षष्ठीतत्पुरुष करके स्वाध्याय का अर्थ हुआ "वेद,"अध्येतव्यः" पढ़ना चाहिए ।लिड़्,लेट् ,लोट्, तव्यत् आदि विधान के लिए हैं। प्रकृत वाक्य से वेदाध्ययन का विधान किया गया है।ध्यातव्य है कि स्वशाखा वेद ही है ।यह अध्ययन किस किस को कैसी योग्यता उपलब्ध होने पर करना चाहिए?| इस शंका को निर्मूल करने के लिए शतपथ ब्राह्मण का वचन है- "अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत" तमध्यापयेत्","एकादशवर्षं राजन्यं " "द्वादशवर्षं वैश्यम् "| आठ वर्ष के ब्राह्मण का उपनयन करे और उसे पढ़ाये । इसी प्रकार ११वर्ष के क्षत्रियऔर १२वर्ष के वैश्य का उपनयन करके उन्हें पढ़ाये | किसका उपनयन कब हो? –इसे भी बताया गया है –मीमांसा के प्रौढविद्वान् शास्त्रदीपिकाकार ” पार्थसारथि मिश्र सप्रमाण लिखते हैं–"वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत,ग्रीष्मे राजन्यं शरदि वैश्यम् इति द्वितीयानिर्देशादुपनयनसंस्कृतास्त्रैवर्णिकाः||अध्याय१पाद१,अधिकरण१सूत्र१"||वसन्त काल में ब्राह्मण का उपनयन करे,ग्रीष्म में क्षत्रिय और शरद् ऋतु में वैश्य का ।भगवान् वेद के इन वचनों में सर्वत्र,"ब्राह्मणम्,राजन्यं, वैश्यम् इस प्रकार द्वितीयान्त पुल्लिंग का ही प्रयोग हुआ है, शुद्र और स्त्रीलिंग का नही । अतः उपनयन पुरुषों का ही होगा ,स्त्रियों का नहीं |यह बात सामान्य व्याकरण– अध्येता को भी ज्ञात है कि पुंस्त्व की विवक्षा मेंपुल्लिंग और स्त्रीत्व की विवक्षा होने पर टाप् ,ड़ीप् आदि प्रत्यय होकर टाबन्त ड़ीबन्त अजा,ब्राह्मणी,क्षत्रिया,वैश्या आदि शब्दों का प्रयोग होता है ।जब घोड़ा मगाना होगा तब "अश्वमानय "ही बोला जायेगा । और घोड़ी मगाना होगा तो "अश्वामानय" ही बोलेंगे ।इन तथ्यों को ध्यान में रखकर देखें कि उपनयन श्रौतवचनों से किसका कहा जा रहा है ? पुरुष का या स्त्री का ? "पशुना यजेत इत्यादि स्थलों में पुंस्त्वआदि की विवक्षा है ;क्योंकि महर्षि पाणिनि जैसे सूत्रकार ने"तस्माच्छसो नः पुंसि ,स्त्रियाम्,अजाद्यतस्टाप्,स्वमोर्नपुंसकात् "जैसे सूत्रों द्वारा पुल्लिंग में अकारान्त शब्दों से परे शस् के स् को न् ,स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् आदि तथा नपुंसक लिंग में अदन्तभिन्न शब्दों से परे सु और अम् विभक्ति का लोपकहा है । अतः इन तथ्यों को मानकर ही अर्थ करना चाहिए | तथा लिंगम्"पूर्वमीमांसा–४/१/८/१६,सूत्र से महर्षि जैमिनिने पाँचहजार वर्ष पूर्व ही इस तथ्य की पुष्टि कर दी थी । महर्षि पाणिनि के पहले भी शाकटायन, आदि अनेक वैयाकरण हो चुके हैं| वेदों की आनुपूर्वी में प्रवाहनित्यता मानें या और कुछ, उसमें परिवर्तन ईश्वर भीनही करता । तात्पर्य यह कि समयानुसार वेद नही बदलते हैं |वेद से भिन्न जो स्मृतियां हैं उनका प्रामाण्य वेदमलकत्वेन ही है ,वेदविरुद्धहोने पर वे अप्रमाण की कोटि में चली जाती हैं-ये दोनो सिद्धान्त क्रमशः"स्मृत्यधिकरण१/३/१/२"विरोधाधिकरण१/३/१/३-४| पूर्वमीमांसासे सर्वमान्य हैं ।" विरोधे त्वनपेक्ष्यं स्यादसति ह्यनुमानम् ” १/३/१/३सूत्र तो इस विषय में अति प्रसिद्ध है ।अतः अपौरुषेय वेद–वसन्ते ब्राह्मणमपनयीत,ग्रीष्मे राजन्यं , शरदि वैश्यम् ” से विरुद्ध "पुराकल्पे तु नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते|| यम स्मृति ||सर्वथाअप्रामाणिक है । इससे वेदप्रतिपादित सिद्धान्त को सञ्कुचित नही किया जा सकता । मनुस्मृति विरुद्धा या सा स्मृतिर्न प्रशस्यते | वेदार्थोपनिबद्धत्वात् प्राधान्यो हि मनोः स्मृतेः||मनुःस्मृति भूमिका पृष्ठ ६|| मनुस्मृतिके विपरीत धर्मादि का प्रतिपादन करनेंवाली स्मृति श्रेष्ठ नहीं हैं क्योंकि वेदार्थ के अनुसार रचित होनेके कारण मनुस्मृति की ही प्रधान्यता हैं | यद् वै किंच मनुरवदत् तद् भेषजम्|| तै०सं०२/२/१०२|| मनुर्वै यत् किंचावदत् तत् भैषाज्यायै||ता०ब्रा०२३/१६/१७|| तैतरीय संहिता एवं तांड्य महाब्राह्मण के अनुसार मनुने जो कुछ कहा हैं,यह सब औषध हैं|"मानव्यो हि प्रजाः" मनुसे पैदा होनेके कारण हम मानव कहलातें हैं| मनु और शतरूपाकी कथा विश्रुत ही हैं| ऋग्वेदके प्रथम मण्डल के ८० वे सूक्तमें-"यामथर्वा मनुष्पिता दध्यङ् धियमत्नतः| तस्मिन् ब्रह्माणि पूर्वथेन्द्र उक्था समग्मतार्चन्ननु स्वराज्यम्||ऋग्वेद१/८०/१५|| यह प्रार्थना हैं कि हम मनुके मार्गसे कहीं गिर न जाएँ | फिर वहाँ यह भी कहा गया हैं कि भारतवर्ष में सबसे पहले मनुने ही यज्ञ किया |अतः मनुस्मृतिका सर्वतो प्राबल्य हैं | अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः| संस्कारार्थे शरीरस्य यथाकालं यथाक्रमम्|| मनुः२/६६|| शरीर संस्कार हेतु प्रसंगक्रमसे प्राप्त और क्रमसे स्त्रियोंके सब संस्कार बिना मन्त्र के ही करना चाहिये | फिर इस श्लोक के आगे मनुजी कहतें हैं कि- वैवाहिको विधिःस्त्रीणां संस्कारो वैदिकःस्मृतः| पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्नि परिक्रिया || मनुः २/६८|| स्त्रियोंका विवाह संस्कार ही वैदिकसंस्कार(यज्ञोपवीत),पतिसेवा ही गुरुकुलवास(वेदाध्ययनरूप), और गृहकीर्य ही अग्निहोत्रकर्म बताया गया हैं| अतः मनुस्मृतिके प्रबल प्रमाणोंसे स्त्रियों का उपनयन किसी भी कल्प में नही होता है । और सभी कल्पों में पुंस्त्वविशिष्टों का ही उपनयन वैदिक सिद्धात है । इससे यह भी सिद्ध होता है कि जब उनका उपनयन ही नही तब वेदाधिकार न होने से वेदमन्त्रसाध्य यज्ञादि कर्मों के आचार्यत्व का वे निर्वहन भी नही कर सकतीं । हां पति के साथ वे प्रत्येक कार्य का सम्पादन करेंगी । पत्नी के विना पति किसी यज्ञादि कर्म का अनुष्ठान नही कर सकता ;क्योंकि आज्यावेक्षणजैसे कर्म यदि नही हुए तो अंगवैकल्य से कर्म फलप्रद नही हो सकता यह तथ्य पूर्वमीमांसा में –६/१/४/८से २० वें सूत्र तक विस्तार से वर्णित है ।ऋषिकाएं –अपाला आदि अनेक ऋषिकाएं हैं जिन्हे वेदमन्त्रों का साक्षात्कारहुआ है –यह वेद से ही सिद्ध है । अतः इनका वेदाध्ययन में अधिकार था या नही ?|समाधान अपाला आदि ऋषिकाओं का वेदमन्त्रद्रष्टृत्व जैसे वेदबोध्य है| वैसे ही स्त्रियों के लिए वेदाध्ययन के अंग उपनयन का अभाव भी वेदबोध्यही है । यह तथ्य पूर्व में निर्णीत हो चुका है ।अतः अपाला जैसी महनीय नारियों के भी वेदाध्ययन की कल्पना वेदविरुद्धहै । रही मन्त्रसाक्षात्कार की बात, तो वह प्रकृष्ट तपःशक्ति से ही सम्भव है । जब ५ वर्ष के तपःसंलग्न ध्रुव में भगवत्कृपा से सरस्वती प्रकट हो सकती हैं तो अपाला जैसी नारियों में क्यों नहीं ? तप अनेक प्रकार के होते हैं जिनमे स्त्रियों का अधिकार है तभी तो भगवान् श्रीराम ने शबरी जी से पूंछा था कि आपका तप बढ़ रहा है न? –क्वचित्ते वर्धते तपः||वाल्मीकि रामायण -अरण्यकाण्ड-७४/८||आज भी कर्मकाणड में देवताओं को यज्ञोपवीत चढ़ाया जाता है देवियों– गौरी आदिको नहीं –इसका मूल नारियों के उपनयन का अभाव ही है ।भगवती सरस्वती विद्या की अधिष्ठात्री देवी है। उनकी कृपा से मूढ भी चारोंवेदों का ज्ञाता हो सकता है । किन्तु इससे सरस्वती जी के वेदाध्ययन और उपनयन की कल्पना तो नही की जा सकती । मारीच जैसा राक्षस भी रावण से बात करते हुए जिनके पति श्रीराम को विग्रहवान् धर्म कहता है । धर्मशिक्षणहेतु अवतरित उन भगवान् श्रीराम से अभिन्न उनकी प्रियतमा पराम्बा जानकी जी के लिए हम वेदविरुद्ध उपनयन और वेदाध्ययन की कल्पना नहीं कर सकते |
ॐस्वस्ति || पु ह शास्त्री उमरेठ|| शेष पुनः
षोडशसंस्काराः (उपवीतम्) खंड १११~ ब्रह्मपुराणमें कहा गया हैं-" जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते |
विद्यया वापि विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते ||
अर्थात् ब्राह्मण माता-पिताके सविधि विवाहसे उत्पन्न शिशु ब्राह्मण हैं ,जब उस बटुका यज्ञोपवीत-संस्कार होता हैं,तब वह "द्विज"(दूसरा जन्म प्राप्त) कहा जाता हैं और वह वेदाध्ययन एवं यज्ञाग्नि धर्मकार्य करनेका अधिकारी होता हैं | वेदज्ञान प्राप्त करनेसे वह " विप्र" तथा "श्रोत्रिय" कहलाता हैं | जब उत्कट तपस्याद्वारा चित्तशुद्धि कर ब्रह्मसाक्षात्कार करता हैं,तब वह ब्रह्मनिष्ठ होता हैं | " ब्राह्मण क्षत्रिय विशस्त्रयो वर्णा द्विजातयः||व्यासः|| व्यास कहतें हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य यह तीन वर्ण द्विजातियाँ(द्विज)हैं |" तेषां जन्म द्वितीयं तु विज्ञेयं मौञ्जिबन्धनम् ||शङ्खस्मृतिः१/६|| शङ्खने कहा हैं कि इन तीन द्विजातियों का दूसरा जन्म यज्ञोपवीत-संस्कारसे होता हैं | आज जब अन्य जातियाँ और सम्प्रदाय अपनी अपनी सांस्कृतिक धरोंहरों,प्रतीकोंको खोज-खोजकर उन्हें पुनः स्थापित और संवर्धित करनेमें जुटे हैं | विडम्बना हैं कि संस्कृतिके पुरोधा कहे जानेवाले हम इनके प्रति उपेक्षित भाव रखते हुए पाश्चात्त्य संस्कृतिके कृत्रिम प्रकाशकी ओर भागनेका प्रयास कर अपने-आपको गौरवान्वित समझ रहे हैं | इसलिये विचारकर यह निर्णय लेना हैं कि हम उन संस्कारोंको सही तरहसे तथा समय-समयपर अपनायें,जिनकी नींवपर हमारी संस्कृति खड़ी हुई हैं | इन्हीमें "यज्ञोपवीत" भी द्विजातियोंका एक संस्कार हैं | हिन्दू धर्म और संस्कृतिका आधार उसकी आध्यात्मिकता हैं,जो पवित्र संस्कारोंसे मार्जित आचार-व्यवहार और सद्व्रतपर टिकी हैं | आचार-व्यवहार वैयक्तिक हैं | ये मनके प्रभावसे उद्भूत और नियन्त्रित होतें हैं | प्रकृतिके अविच्छिन्न सम्पर्कमें रहनेसे ये शारीरिक और मानसिक मलों(दोषों) से आवृत होकर दूषित हो जातें हैं | यद्यपि मानवका अस्तित्व प्राण(आत्मा) पर अवलम्बित हैं,किंतु तन-मनके अधीन रहकर वह अनैतिक और अधर्म करनेके लिये विवश हो जाता हैं | मानवके तन-मनसे अपवित्र भाव,मल तथा दोषका परिमार्जन कर उनकी निवृत्ति करना और शुचिता,पवित्रता तथा पुण्यका भाव मन,वाणी एवं व्यवहारमें प्रतिष्ठित करना "संस्कार" हैं | वैदिक एवं स्मार्त सामान्य -विशेष कर्मोंके आचरणसे शारीरिक तथा मानसिक मलोंका परिमार्जन कर पवित्र और उत्कृष्ट बनाते हुए मानवको निर्वाण(मोक्ष) प्राप्त करनेयोग्य- अधिकारी बनाना संस्कार हैं | शास्त्रकारोंने संस्कारोंमें भी यज्ञोपवीत संस्कारकी महिमा कही हैं | "उपनयन" का अर्थ होता हैं,गुरुके पास ले जाना; बालकको गायत्रीमंत्रके उपदेश हेतु तथा वेदाभ्यास के लिए आचार्यके पास ले जाना होता हैं | यह मनुष्यके आध्यात्मिक जीवनमें प्रवेशका द्वार हैं | इसके बाद बालकका पुनर्जन्म होनेसे द्विज कहलाता हैं | एक प्रकारसे प्राकृत शरीरकी मृत्यु और उसमेंसे एक नयें भावका आविर्भाव होता हैं| एक प्रकारसे स्वच्छन्दतामें स्वतन्त्रताके संक्रमणका यह प्रारंभिक बिन्दु हैं | स्वच्छन्दताका अर्थ हैं,बन्धन अस्वीकारता और स्वतन्त्रताका अर्थ हैं,आत्मसंयमसे अपनी तथा समष्टिकी इच्छाको जोड़ना | सामान्य अर्थोंमें यज्ञोपवीत तीन तागोंके जोड़में लगी ग्रन्थियोंसे युक्त सूतकी एक माला हैं | जिसे ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य धारण करतें हैं | वैदिक अर्थमें यज्ञोपवीत शब्द "यज्ञ" और "उपवीत" इन दो शब्दोंके योगसे बना हैं,जिसका अर्थ हैं " यज्ञसे पवित्र किया गया सूत्र|" यज्ञोपवीत-संस्कारको "व्रतबन्ध" उपनयन" और "जनेऊ" भी कहा गया हैं | शास्त्रोंकी आज्ञा हैं -" सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च" अर्थात् सदा गाँठ लगी शिखा एवं यज्ञसूत्र धारण किये रहना चाहिये | यज्ञोपवीत(ब्रह्मसूत्र) हैं | जो शोभाके लिये या अनुष्ठान के समय ही धारण करने एवं शेष समयमें उतारकर किसी खूँटीमें टाँग देने लायक नहीं हैं | ऐसा करनेवाले पापके भागी होतें हैं | यहाँ बताना उचित होगा कि साकार परमात्माको "यज्ञ" और निराकार परमात्माको "ब्रह्म" कहा गया हैं | इन दोनों को प्राप्त करनेका अधिकार दिलानेवाला यह सूत्र यज्ञोपवीत हैं | ब्रह्मसूत्र" सवितासूत्र" तथा यज्ञसूत्र इसीके नाम हैं | स्मृतिप्रकाशमें इसके ब्रह्मसूत्र नामकी सार्थकताके विषयमें कहा गया हैं-" सूचनाद् ब्रह्मतत्त्वस्य वेदतत्त्वस्य सूचनात् | तत्सूत्रमुपवीतत्वाद् ब्रह्मसूत्रमिति स्मृतम् || अर्थात् यह सूत्र द्विजातिको ब्रह्मतत्त्व और वेदज्ञानकी सूचना देता हैं,इसलिये इसे " ब्रह्मसूत्र" कहा गया हैं | यज्ञोपवीतकी उत्पत्ति और प्रचलनका कोई ऐतिहासिक प्रमाण प्राप्त करना या काल निर्धारण करना मानबुद्धि के वशकी बात नहीं हैं | इसका सम्बन्धतो उस कालसे लगाया कया हैं,जब प्रलयके गर्भमें अनन्तकालसे प्रसुप्त मानवसृष्टिका नवोदय प्रारम्भ हुआ था,उस समय श्री ब्रह्माजी स्वयं यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे | इसलिये यज्ञोपवीत धारण करते समय यह मन्त्र पढा़ जाता हैं-" यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्" साररूप यह मन्त्र ही यज्ञोपवीतकी उत्पत्तिका स्पष्ट सङ्केत देता हैं |
ॐस्वस्ति | पु ह शास्त्री उमरेठ | शेष पुनः
षोडशसंस्काराः (यज्ञोपवीतम्)खंड११२~ यज्ञोपवीत किन्हीं परवर्ती ऋषियोंद्वारा निर्मित सूत्र नहीं था और न ही किसी सामाजिक या विद्याचिन्हके रूपमें स्थापित किया गया हैं | यज्ञोपवीत निर्माणकी जो विशेष प्रक्रिय् निश्चित की गयी हैं,वह स्पष्टतया यह प्रतिपादित करती हैं कि यज्ञोपवीत ईश्वरद्वारा द्विजातिको सौंपे गये उत्तरदायित्वोंके विर्वहणके लिये गुरुके सांनिध्यमें आवश्यक शिक्षा और योग्यता प्राप्त करने हेतु प्रस्थित होनेका उदात्त भावनाओंसे युक्त संकेत हैं |
**यज्ञोपवीत निर्माण विधिः***-" ग्रामाद्बहिस्तीर्थे गोष्ठे वा गत्वाऽनध्याय वर्जित पूर्वाह्णे"-( गाँवके बहार पवित्र जगह जहाँ पतितोंका अवागमन न हो(निर्जन),अथवा गोशालामें जाकर अनध्याय सूचित दिनोंको छोड़कर अन्य दिनोंमें पूर्वाह्नकालमें सुबह १०/४० से पहले(यज्ञोपवीत निर्माण करतें समय कमसे कम एक/सवा घंटा लगता हैं)-" कृतसंध्याष्टोत्तरशतं सहस्रं वा यथाशक्ति गायत्रीं जपित्वा"-( प्रातःसंध्यासमाप्तकर यज्ञोपवीत निर्माण अधिकार सिद्धिके लिये १०८/१००८ अथवा यथाशक्ति गायत्री मंत्रका संयमित होकर जप करैं)-" ब्राह्मणेन तत्कन्याया सुभगाया धर्मचारिण्या वा कृतं सूत्रमादाय"-( ब्राह्मण, ब्राह्मणकी कन्या,सौभाग्यवतीब्राह्मणी अथवा स्वधर्ममें श्रद्धा रखकर आचरण करनेवाली द्विज-स्त्री(अविच्छिन्न परम्परा कालक्रम से प्राप्त उपनयन-संस्कार से संस्कृत-द्विजों की पत्नी अर्थात् व्रात्यों की स्त्री नहीं ) से बना हुआ एकतारका सूत्र लें" *वर्त्तमानमें मिलना सम्भव न हों तो कहे गये सूत्रकारों से कुछ दक्षिणा देकर उनके हाथसे खरीदा हुआ सूत्र लें)-" भूरिति प्रथमां षष्णवतीं-"( बायें हाथकी चारों अंगुलीयोंके अँत्यपर्वोंपर ॐभूः -प्रथमव्याहृतिमंत्र पढकर ९६ बार वेष्टित कर वह चौआ ढाकके पत्तेपर रख दैं)-"भुवरितिद्वितीयां-"(ॐभुवः- द्वितीय व्याहृतिमंत्रपढकर पुनः दूसरीबार सूत्रसे ९६ चौआ लगायें वह भी दूसरे पलाशके पत्रमें रखें) -" स्वरितितृतीयांमीत्वा पृथक् पलाशपत्रे संस्थाप्य-"( ॐस्वः- तृतीय व्याहृतिमंत्र पढकर पुनः तीसरीबार सूत्रसे ९६ चौआ लगाकर वह भी तीसरे ढाकके पत्तेपर रखें)-"आपोहिष्ठेति तिसृभिः,शं नो देवीत्यनेन सावित्र्या चाभिषिच्य"-( तीनोको तीर्थजल या शुद्धजलसे आपोहिष्ठा० १,जो वः शिवतमो ०२, तस्माऽअरङ्ग ०३… इन तीनोंमंत्रोसे शं नो देवी०मंत्रसे तथा गायत्रीमंत्रसे अभिषिक्त करैं)-" वामहस्ते कृत्वा त्रिः संताड्य"-( बायें हाथमें तीनों चौओंको लेकर दायें हाथसे तीनबार ताड़न करैं)-" व्याहृतिभिस्त्रिवणितं कृत्वा"-( ॐभूर्भुवःस्वः- इनतीन व्याहृति मंत्रोंसे तीनोके तारको एकजुट करकें तीनगुना करैं,-" इसमें दूसरे ब्राह्मण या खूटीकी आवश्यकता रहती हैं)-" पुनस्ताभिस्त्रिगुणितं कृत्वा"-( फिरसे उन तीनगुणे सूत्रको फिरसे तीनगुणा करनेसे नवतार हो जायेंगें इनको तकली(साधन)की मददसे या दूसरे ब्राह्मणकी मददसे नवतारका एक दृढसूत्र बनायें )-" पुनस्त्रिवृतं कृत्वा"-( इस नवतारके सूत्रका " जिसको पहनाना हैं उनके कँधेसे कटीतकके माप अनुसार तीनगुना करैं)-" प्रणवेनग्रन्थिंकृत्वा"( ॐ इस प्रणवमंत्रसे ब्रह्मग्रन्थि लगावें(द्विरावृत्याथमध्ये वै अर्धवृत्यान्त देशतः ग्रन्थि प्रदक्षिणावर्ती सा ग्रन्थि ब्रह्मसंज्ञकः||- सूत्रके अन्त्यभागको सूत्रके अग्रभागके अँदरसे लेकर तीनों वृत्तोको प्रदक्षिणावत् दोबार लपैंटकर सूत्रकेअग्रभागमें आधी प्रदक्षिणवत् लपैटकर दृढगाँठ लगाना सूतके अग्रान्तभागपर दूसरी दो गाँठ लगायें), यह तीन धागेवालीं नवसूत्रकी एक जनेऊ हुई ऐसै ही दूसरी,तीसरी आदि जरुरीयात अनुसार बनाकर)-"ऑंकारमग्निं नागान् सोमं पितॄन् प्रजापतिं वायुं सूर्यं विश्वान् देवान् नवतन्तुषु क्रमेण विन्यस्य संपूजयेत् |-( ऑंकार,अग्नि,सोम,पितर,प्रजापति,वायु,सूर्य, विश्वेदेवों, का नवतन्तुओंमें तथा ग्रन्थिओंमें ब्रह्मा,विष्णु,रुद्रका क्रमसे न्यास करकें पूजन करैं)-" देवस्येत्युपवीतमादाय,-( देवस्यत्वा सवितुःइन आधे मंत्रसे यज्ञोपवीत को लेकर)-" उद्वयं तमसस्परीत्यादित्याय दर्शयित्वा-"( उद्वयं तम० इसमंत्रसे सूर्यनारायणको बताकर)-" यज्ञोपवीतमित्यनेन धारयेदित्याह भगवान्कात्यायनः||कात्यायनपरिशिष्ठ|| -"( यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं० इस मंत्रसे धारण करैं ऐसा भगवान् कात्यायन कहतें हैं|
यह केवल यज्ञोपवीत निर्माणकी विधि बतायीं हैं- विस्तारसे यज्ञोपवीत-संस्कार का विधान अलगसे हैं| बाजारमें मिलतीं तैयार यज्ञोपवीतमें ऐसा कोई विधान नहीं हो सकता और न पवित्रता |
ॐस्वस्ति| पु ह शास्त्री उमरेठ| शेष पुनः
षोडशसंस्काराः (यज्ञोपवीतम्)खंड११३~ यज्ञोपवीतके निर्माणके सम्बन्धमें प्रथम प्रश्न यह उपस्थित होता हैं कि यज्ञोपवीतका परिमाण ९६ ही क्यों निर्धारित किया गया? यदि इसका परिमाण कम या अधिक हो जाता तो उससे क्या हानि होती?
दूसरा प्रश्न- यह हैं कि प्रत्येक वर्णमें हर व्यक्ति एक ही कद और काठीका नहीं होता हैं | कोइ ऊँचे कदका होता हैं तो कोई नाटा| कुछ स्थूल शरीरवालें होतें हैं तो अन्य दूबले-पतले | अतः सभी व्यक्तियोंके लिये एक ही परिमाणका यज्ञोपवीत धारण करनेका नियम क्यों बनाया गया ?
इस सम्बन्धमें महर्षियों और शास्त्रकारोंने इस आधारपर यज्ञोपवीतका परिम्ण निर्धारित किया कि-" पृष्ठदेशे च नाभ्यां च धृतं यद्विन्दते कटिम् | तद्धार्यमुपवीतं स्यान्नातिलम्बं न चोच्छ्रितम् ||" धारण करनेपर वह पुरुषकें बायें कन्धेके ऊपरसे आता हुआ नाभिको स्पर्शकर कटितक ही पहुँचे | इससे न तो ऊपर रहैं और न ही नीचे | " आयुर्हरत्यति ह्रस्वमतिदीर्घं तपोहरम् | यशोहरत्यतिस्थूलमतिसूक्ष्मं धनापहम्||वीरमित्रोदय|| अत्यन्त छोटा होनेपर यज्ञोपवीत आयुका तथा अधिक बड़ा होनेपर तपका विनाशक होता हैं | अधिक मोटा रहेगा तो वह यशनाशक और अधिक पतला होगा तो धनकी हानि होगी | इस निर्णयको सामुद्रिक शास्त्रने उचित ठहराया हैं | उसके अनुसार मनुष्यका कद और स्वास्थ्य कैसाभी हो,मानव-शरीर आयाम ८४ अँगुलसे १०८ अँगुलतक ही होता हैं | इसका मध्यमान ९६ अँगुल ही होता हैं | अतः इस परिमाणवाला यज्ञोपवीत हर स्थितिमें कटितक ही रहेगा न उपर और न ही नीचे |
गायत्री वेदमाता हैं | प्रत्येक मन्त्रका उद्भव इन्हींसे हुआ हैं,यगोपवीत -निर्माण और उसे अभिमन्त्रित करते समय गायत्रीमन्त्रको प्रधानता दी गयी हैं | " चतुर्वेदेषु गायत्री चतुर्विंशतिकाक्षरी | तस्माच्चतुर्गुणं कृत्वा ब्रह्मतन्तुमुदीरयेत्|| वसिष्ठ स्मृति||" गायत्रीमन्त्रमें चौबीस अक्षर होते हैं | चारौं वेदोंमें व्याप्त गायत्रीछन्दके सम्पूर्ण अक्षरोंको मिला दैं तो २४×४=९६ अक्षर होतें हैं,इसीके आधारपर द्विजबालकको गायत्री और वेद दोनोंका अधिकार प्राप्त होता हैं | इसलिये ९६ चौआवाले यज्ञोपवीतको ही धारण करनेका विधान किया हैं | वर्णाश्रम व्यवस्थामें ब्रह्मचर्याश्रमके अन्तर्गत द्विजबालकको गुरुके सांनिध्यमें उनकी सेवा करते हुए वेदाध्ययनसहित नैतिक कर्म,उपासना आदिकी शिक्षा प्राप्त करनेके अनन्तर गृहस्थाश्रमका अधिकार प्राप्त होता हैं | चतुर्थाश्रम संन्यास ग्रहण करनेपर वह कर्म और उपासनासे पूर्णतः मुक्त होकर केवल ज्ञानप्राप्तिका अधिकारी रह जाता हैं | इस स्थितिमें वह शिखा और सूत्र - दोनोंका त्याग कर देता हैं | वेदकी मर्यादाके अनुसार उपनीत होनेवाले द्विजको ही वेद और कर्मकाण्डका अधिकारी बताया गया हैं|" लक्षं तु चतुरो वेदा लक्षमेकं तु भारतम् ||" इस आप्तवचन में वैदिक ऋचाओंकी संख्या एकलाख बतायी गयी हैं | वेदभाष्यमें पतञ्जलिने भी इसकी पुष्टि की हैं | इन लक्षमन्त्रोंमें ८०,००० कर्मकाण्ड-सम्बन्धी ४,००० ज्ञानकाण्ड और१६००० उपासनाकाण्ड सम्बन्धी ऋचाएँ हैं | चूँकि उपनीतको कर्मकाण्ड और उपासना -काण्डका अध्ययन करनेका अधिकार प्राप्त होता हैं,अतः ९६०००ऋचाओंके अधिकारके आधारपर उपवीतका परिमाण ९६ चौआ निर्धारित किया गया हैं | मानव जीवन भाग्यसे प्राप्त होता हैं |" तिथिवारं च नक्षत्रं तत्त्ववेदगुणान्वितम् | कालत्रयं च मासाश्च बारह्मसूत्रं हि षष्णवम् ||सामवेद छन्दोगपरिशिष्ट||" यह जीवन तत्त्वों,गुण,तिथि,वार,नक्षत्र,काल,मास आदि विविध भागोंसे निरन्तर सम्पर्कमें रहनेके कारण उनसे प्रभावित होता रहता हैं | अतः जीवनके एक-एक क्षणको प्रभुका अमित वरदान समझनेवाले महर्षियोंने इन भागोंके महत्त्वको समझकर उनका अवलम्बन करके ब्रह्म-प्राप्तिका शाश्वत लक्ष्य मनुष्यके लिये निर्धारित किया | इन सभी पदार्थोंकी संख्याका समन्वित योग किया जाय तो आश्चर्य होगा कि यह भी ९६ का योग बनता हैं,यथा- (१)मनुष्यके सत्,रज,और तमोगुणमय त्रिविध शरीरमें प्रकृतिप्रदत्त पाँचभूत,पाँच कर्मेन्द्रियाँ,पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ,पाँच प्राण और चार अन्तःकरणका योग २४ तत्त्वोका समावेश रहता हैं | तीन ग्रन्थियाँ स्थूल,सूक्ष्म और कारण शरीरवाले मनुष्यके आत्मरूपपर त्रिगुणात्मक आवृत्तिसे बहत्तरका योग बनाती हैं | इस शरिरके निराकरण एवं भेदनके लिये चौबीस अक्षरात्मक गायत्रीमन्त्रका जप किया जाता हैं | यही प्रकृतिके तत्त्वोंसे आत्माको मुक्त कराती हैं | यदि इन सबका योग करैं तो परिमाण ७२+२४=९६ आता हैं | अतः इन तत्त्वों और गायत्रीमन्त्रका प्रभाव दरसाने और मुक्तिके लिये गायत्रीमन्त्र जपते रहनेका संकेत करते रहने हेतु द्विजको ९६ परिमाणवाले यज्ञोपवीतको धारण करानेका विधान किया गया हैं |(२) इस गूढ तथ्यको इस दृष्टिकोणसे भी समझा जा सकता हैं | हमारा शरीर २५ तत्त्वोंसे बना हैं | इसमें सत्त्व,रज और तम - ये तीन गुण सर्वदा व्याप्त रहतें हैं | फलतः २८ संख्यात्मक समुदायवाले शरीरको तिथि,वार,काल,नक्षत्र,मास,वेदादि विविध भागोंमें विभक्त,अनेक संवत्सरपर्यन्त इस संसारमें जीवन धारण करना पड़ता हैं | यदि इनका योग करैं तो यह भी ९६ ही होता हैं | देखिये- तिथि१५+वार७+ नक्षत्र२७+तत्त्व२५+ वेद ४+ गुण ३+ काल ३+ और मास १२इनका कुलयोग =९६ आता हैं|
ॐस्वस्ति ||पु ह शास्त्री. उमरेठ|| शेष पुनः
षोडशसंस्काराः (यज्ञोपवीतम्)खंड ११४~ हिन्दू धर्ममें तीनकी संख्या आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक- सभी क्षेत्रोंमें विशेष महत्त्व रखता हैं |ब्रह्मा,विष्णु और महेश त्रिदेव हैं | तीनकाल- भूत,वर्तमान और तम - तीन गुण हैं | तीन ऋतुएँ- त्रिलोक; इसी त्रिगुणात्मक भावको आधार बनाकर यज्ञोपवीतका त्रिगुणात्मक तन्तुओंसे निर्माण और उसका त्रिवृत्करण किया गया हैं | तीन सूत्रमें मानवत्व,देवत्व और गुरुत्व भाव निहित हैं | इन्हीं की प्रेरणा,मार्गदर्शन और शिक्षासे मृत्युलोकसे द्युलोककी और ऊर्ध्वगमनके लिये उपासना,ध्यान और सत्कर्म भाव मानव अपनाता हैं | यही उसके निर्वाण के मार्गको प्रशस्त करता हैं | इसी भावनासे तीन तारोंको महाव्याहृति मन्त्रोंसे ऊपरकी और उमेठते हुए नौ तन्तुमय सूत्रका निर्माण किया गया हैं | ये नौ तन्तु नौ देवताऔंके आवास स्थान हैं,जहाँ उनका विधिपूर्वक आवाहन,पूजन और प्रतिष्ठापन(यज्ञोपवीत तैयार हो जाने पर) किया जाता हैं | नौ देवता- ॐकारोऽग्निश्च नागश्च सोमः पितृप्रजापती | वायुः यमश्च(सूर्यश्च),सर्वश्च तन्तुदेवा अमी नव || साम०छन्दो०परि|| ॐकार,अग्नि,नाग,सोम,पितर,प्रजापति, वायु,यम(सूर्य), विश्वेदेवों - हैं | इन देवताओंकी प्रतिष्ठापनासे मानव अपने हृदयमें तत्तद् देवताओंके विशेष गुणों यथा-ब्रह्मलाभ,तेजस्विता,धैर्य,आह्लादकत्व,स्नेह,प्रजापालन,
शुचित्व,प्राणत्व आदि गुणोंको धारण करते हुए अनुभव करता हैं कि मैंने इन गुणोंसे परिपूर्ण और देवताओंसे अधिष्ठित उपवीतको धारण कर लिया हैं | अब मैं तेजस्वी हूँ,धृतिमान् हूँ,शुद्ध हूँ | देवताओंकी विद्यमानता और उनके गुणोंको आत्मसात् करनेकी इस अनुभूतिसे मानवके हृदयमें उपजे मल और मानसिक कुवृत्तियोंका परिमार्जन होगा तथा मनसहित समस्त इन्द्रियाँ विपथगामी न होकर सन्मार्गपर चलनेके लिये प्रवृत्त होंगी | यह भावना अतिरेक या अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं,अकाट्य तथ्य हैं | मनुष्यके मनमें यह भावना रहेगी कि देवताके सांनिध्यमें पापाचार करना,नरकका हेतु होगा | आपने अनुभव किया अथवा देखा होगा कि जब कभी मनुष्य शास्त्रनिर्दिष्ट मार्गका त्याग कर विपथगामी होने लगता हैं तो वह सर्वप्रथम यज्ञोपवीत और शिखाको ढोंग कहकर त्याग देता हैं | इससे वह यह अनुभव करता हैं कि वह धर्मके बन्धनसे मुक्त हो गया हैं | मनुष्यका यह कृत्य ही स्पष्ट करता हैं कि यज्ञोपवीत धारण करनेंसे उसमें समाविष्ट कोई-न-कोई शक्ति मानवको विपथगामी होनेेसे बचाने हेतु चेतावनी देते हुए उसे पापाचरणमें प्रवृत्त होनेसे अवश्य रोकती रही होगी | यगोपवीत-निर्माणकार्यमें नौ तन्तुओंको त्रिगुणात्मक कर,तीनसूत्रमें परिवर्तितकर,उसका त्रिवृत्करण करके उसके मूलोंको जोड़नेमें प्रणवरूपी महामन्त्रका उच्चारण करतें हुए ब्रह्मग्रन्थि लगाये जानेका विधान किया गया हैं | इस ब्रह्मग्रन्थिके लगनेपर यज्ञोपवीत धारण करने योग्य बन जाता हैं| ब्रह्मग्रन्थिको लगानेका अभिप्राय यह हैं कि मनुष्य प्रतिक्षण ध्यानमें रखे कि यह समस्त विश्व ब्रह्मसे प्रादुर्भूत हुआ हैं और इसीमें मानवका कल्याण संनिहित हैं | यदि मानव ब्रह्मको भुलाकर उसके माया-जालमें फँस जाता हैं तो वह ब्रह्मत्त्वको भूलकर काम,क्रोध,लोभ,मोहादि सांसारिक प्रपञ्चोंमें लिप्त होकर अपने ही पतनका कारण बन सकता हैं | उसे प्रचलित लोकोक्ति" गाँठ बाँध लेना" को ध्यानमें रखतें हुए गाँठ बाँध लेना चाहिये कि मनुष्यका ब्रह्मप्राप्ति ही चरम लक्ष्य हैं और इसे प्राप्त करनेके लिये उसे शास्त्रनिर्दिष्ट श्रेयमार्गपर चलते रहना होगा | यज्ञोपवीतके धारणका उद्देश्य और लक्ष्य भी यही रहा हैं; अतः इसके मूलमें प्रणव-मन्त्रके साथ लगायी जानेवाली ग्रन्थि उसे प्रणवके "अ+उ+म्" इन तीनों वर्णों,सत्त्व,रज तथा तम- इन तीन गुणों एवं ब्रह्मा विष्णु और महेशरूपी ब्रह्माण्डनियामक त्रिविध शक्तियोंके सामीप्यका ध्यान दिलाती रहती हैं | इसीलिये इसे ब्रह्मग्रन्थि कहा गया हैं | समाजमें मनुष्यको ब्रह्मके साथ-साथ अपनी कुल-परम्पराको भी ध्यानमें रखना होता हैं | अतः ब्रह्मग्रन्थिके ऊपर अपने-अपने कुल,गोत्र,प्रवरादिके भेदसे १,३, या ५ गाँठ लगाये जानेका शास्त्रीय विधान हैं | ये ग्रन्थियाँ मनुष्यको अपनी कुल-परम्परासे जली आ रही शास्त्रमर्यादाकी रक्षा करते हुए उन पुण्यात्मा पूर्वजोंका स्मरण कराती हैं,जिनका वह उत्तराधिकारी हैं और जिनकी तपश्चर्या और सत्कर्मोंसे उसे उस कुलमें जन्म लेनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ,साथ ही उन्हींके पदचिन्होंपर चलनेकी प्रेरणा देती हैं | द्विज सदा याद रखे कि उसमें भी ब्रह्मका अँश हैं और अन्तमें इसीमें लय होना हैं |
ॐस्वस्ति | पु ह शास्त्री. उमरेठ| शेष पुनः
षोडशसंस्काराः (यज्ञोपवीतम्)खंड११५~" न ह्यस्मिन् युज्यते कर्म किञ्चिदामौञ्जिबन्धनात् ||मनुः२/१७१||मनुस्मृतिमें आया हैं कि यज्ञोपवीत-संस्कारविहीन द्विज धर्मकर्मादि करनेका अधिकारी नहीं होता | ॐकारः प्रथमे तन्तौ द्वितीयेवग्नि स्तथैव च | तृतीये नागदैवत्यं चतुर्थे सोमदेवता || पञ्चमे पितृदैवत्यं षष्ठे चैव प्रजापतिः| सप्तमे मारुतश्चैव अष्टमे सूर्य(यम) एव च || सर्वे देवास्तु नवम इत्येतास्तन्तु देवताः|| ब्रह्मणोत्पादितं सूत्रं विष्णुना त्रिगुणीकृतम् |रुद्रेण दत्तो ग्रन्थिर्वै सावित्र्या चाभिमन्त्रितम्||हरिहरभाष्ये||" ॐकार १तन्तुके,अग्नि २ के,नाग ३ के,सोम ४ के,पितर ५ के, प्रजापति ६ के,अनिल ७के, सूर्य(यम)८के, विश्वेदेवों ९ तन्तुओंके देवता हैं| ब्रह्माजीके साथ उत्पन्नहोनेवाला जनेऊ द्विजोको किसविधसे मिला?-ब्रह्माजीने यज्ञोपवीत सूत्र उत्पन्न किया और विष्णु जी के द्वारा सत् रज तम तीनो गुणों से तीन धागे का लड् युक्त अर्थात त्रिगुणीकरण किया गया।एवं भगवान रुद्रने इसमें ग्रंथि देकर सविता मंत्र (गायत्री मंत्र) से अभिमंत्रित किया। अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयेद्गर्भाष्टमे वा||एकादशवर्षं राजन्यं|| द्वादशवर्षं वैश्यं|| पा०गृ०२/१-३|| पारस्करगृह्यसूत्रमें ब्राह्मणका गर्भसे या जन्मसे आठवें वर्षमें, क्षत्रियका गर्भसे या जन्मसे ग्यारहवें वर्षमें,वैश्यका गर्भसे या जन्मसे बारहवें वर्षमें उपनयनका काल कहा हैं | "गर्भाष्टऽमे वाऽब्दे पञ्चमे सप्तमेऽपिवा | द्विजत्वं प्राप्नुयाद्विप्रो वर्षे त्वेकादशे नृप ||आश्वालायन|| आश्वालायनका कहना हैं कि गर्भसे या जन्मसे आठवेंमें,अथवा पांचवे वा सातवें वर्षमें ब्राह्मण,ग्यारहवेंमें क्षत्रिय,द्विजत्वको(यज्ञोपवीत)को प्राप्त होतें हैं |" ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे | राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्यार्थार्थिनोष्टमे ||मनुः|| मनुजी के कहनेसे ब्रह्मतेजकी कामनावाले ब्राह्मणका पाँचवेमें,और बलकी इच्छावाले क्षत्रियको छठे वर्ष,और धनकी इच्छावाले वैश्यका आठवें वर्षमें यज्ञोपवीत करना चाहिये | " षष्ठे तु धनकामस्य विद्याकामस्य सप्तमे | अष्टमे सर्वकामस्य नवमे कान्तिमिच्छतः ||विष्णुः|| विष्णुने भी कहा हैं कि धनकी इच्छावाला छठेवर्षमें,विद्याकी इच्छावाला सातवेंमें,सब वस्तुओंकी इच्छावाला आठवें तथा कांतिकी इच्छावाले नवें वर्षमें यज्ञोपवीत करैं |" अथ काम्यानि सप्तमे ब्रह्मर्चसकाममष्टमे आयुष्कामं नवमे तेजस्कामं दशमेऽन्नाद्यकाममेकादश इन्द्रियकामं द्वादशे पशुकाममुपनयेत् || आपस्तम्बः|| आपस्तम्बने कहा हैं कि ब्रह्मतेजकी इच्छावाला आठवेंमें,तेजकी इच्छावाला नवमें,अन्न आदिकी इच्छावाला दशवेंमें,इन्द्रियकी इच्छावाला ग्यारहवेंमे,पशुकी कामनासे बारहवें वर्षमें यज्ञोपवीत करैं || आषोडशाद्ब्राह्मणस्य सावीत्रीनातिवर्तते | आद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः||मनुः|| गौण समय कहतें हैं कि- सोलहवर्ष पर्यन्त ब्राह्मणको,बाईसवर्ष पर्यन्त क्षत्रियको,चौंतीसवर्ष पर्यन्त वैश्यको गायत्री उल्लंघन नहीं करती; अतः उक्त वर्षसे पहले यज्ञोपवीत संस्कार होजाना अनिवार्य हैं | "अग्रजा बाहुजा वैश्याः स्वावधेरूर्ध्वमब्दतः| अकृतोपनयाः सर्वे वृषला एव ते || ज्योतिर्निबन्ध || ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य अपनी -अपनी अवधि के वर्ष से उपर कें वर्षमें उपवीत न हो तो वे सम्पूर्ण शूद्रतुल्य हो जातें हैं |" विप्रं वसन्ते क्षितिपं निदाधे वैश्यं घनान्ते व्रतिनं विदध्यात् | माघादिशुक्लान्तिक पञ्चमासाः साधरणा वा सकलद्विजानाम्||गर्गः|| गार्ग्यने कहा हैं कि ब्राह्मणका वसन्तमें,क्षत्रिय का ग्रीष्ममें,वैश्यका शरद ऋतुमें यज्ञोपवीत करना चाहिये | और माघसे लेकर ज्येष्ठ पर्यन्त पाँच मास सब द्विजोंका यज्ञोपवीत होता हैं |हेमाद्रीमें भी कथन हैं कि-" माघादिषु च मासेषु मौञ्जी पञ्चसु शस्यते ||हेमाद्रौ|| माघ आदि पाँच महीनोंमें मौञ्जीबन्धन(यज्ञोपवीत) श्रेष्ठ हैं|"झषचापकुलीरस्थो जीवोप्यशुभगोचरः | अतिशोभनतां दद्याद्विवाहोपनयादिषु || पारिजाते बृहस्पतिः || पारिजातमें बृहस्पतिका वचन हैं कि - मीन,धन,कर्कका अशुभ भी बृहस्पति विवाह यज्ञोपवीत आदिमें अत्यन्त शुभकर्ता हैं || " न जन्मधिष्ण्ये न च जन्ममासे न जन्मकालीयदिने विदध्यात् | ज्येष्ठे न मासि प्रथमस्य सूनोस्तथा सुताया अपि मङ्गलानि||वृत्तशते || वृत्तशतमें कहा हैं कि जन्मका नक्षत्र,जन्मका महिना,जन्मकादिन(तिथि) और ज्येष्ठ पुत्रका और ज्येष्ठ कन्याका मंगलकार्य न करैं | राजमार्तँडमें भी कहा हैं कि- " जातं दिनं दूषयते वसिष्ठो ह्यष्टौ च गर्गौ नियतं दशात्रिः| जातस्य पक्षं किल भागुरिश्च शेषाः प्रशस्ताः खलु जन्ममासि || वसिष्ठ जन्मके एक दिनको और गर्गऋषि जन्मसे आठदिन और अत्रि ऋषि जन्मसे दशदिन और भागुरि जन्मसे एक पक्ष(पंद्ररदिन)को अनिष्ट कहतें हैं | शेष दिन जन्मके मंगलकार्योंमें श्रेष्ठ हैं |" जन्ममासे तिथौ भे च विपरीत दले सति| कार्यं मङ्गलमित्याहुर्गर्गभार्गवशौनकाः|| यदि जन्मके महीने तिथि और नक्षत्रमें पक्षका भेद हो तो मंगलकार्य करनेमें दोष नहीं; यह गर्ग भार्गव और शौनक ऋषियोंके मत हैं |" जन्ममास निषेधेऽपि दिनानि दशवर्जयेत् | आरभ्य जन्मदिवसाच्छुभाः स्युस्तिथयोपरे ||राजमार्तण्डे|| जन्ममासके निषेध में भी जन्मदिनसे लेकर दशदिन त्याग दैं शेष तिथियाँ श्रेष्ठ हैं | " व्रते जन्मत्रिखारिस्थो जीवोऽपीष्टोऽर्चनात्सकृत् | शुभोतिकाले तुर्याष्टव्ययस्थो द्विगुणार्चनात् | शुद्धिर्नैव गुरौर्यस्य वर्षे प्राप्तेऽष्टमे यदि | चैत्रे मीनगते भानौ तस्योपनयनं शुभम् ||जन्मभादष्टमे सिंहे नीचे वा शत्रुभे गुरौ |मौञ्जीबन्धःशुभः प्रोक्तश्चैत्रे मीनगतौ रवौ ||ग्रन्थान्तरे१-३|| ग्रन्थान्तरमें कहा हैं कि यज्ञोपवीतमें जन्मका तीसरा,छठ्ठा बृहस्पति एकबार पूजनसे उत्तम हैं | अतिकाल हो गया हो तो छठ्ठा,आठवाँ,बारहवाँ भी दूने पूजनसे श्रेष्ठ हैं | यदि आठवें वर्षमें जिस बालककी बृहस्पतिकी शुद्धि न हो,उसका यज्ञोपवीत चैत्रमास और मीनके सूर्य में उत्तम हैं | जन्मसे आठवें, सिंहके,नीचके अथवा शत्रुक्षेत्रके भी बृहस्पति हों तो चैत्रमें और मीनके सूर्यमें यज्ञोपवीत श्रेष्ठ हैं |
ॐस्वस्ति || पु ह शास्त्री, उमरेठ||शेष पुनः||
षोडशसंस्काराः(यज्ञोपवीतम्)खंड११६~ नारदजी कहतें हैं कि-" बालस्य बलहिनोपि शान्त्या जीवो बलप्रदः| यथोक्त वत्सरे कार्यमनुक्त चोपनायनम् ||नारदः|| बलहिन भी बृहस्पति शान्तिसे बालकको बलदायक हैं । शान्ति करवाकर शास्त्रोक्त वर्षमें अथवा अन्य वर्षमें यग्ञोपवीत करलेना चाहिये । "तृतीया पञ्चमी षष्ठी द्वितीया चापि सप्तमी। पक्षयोरुभयोश्चैव विशेषेण सुपूजिताः।।धर्मकामौ सितेपक्षे कृष्णे च प्रथमा तथा। शुक्लत्रयोदशीं केचिदिच्छन्ति मुनयस्तथा।।ज्योतिर्निबन्धे नृसिंह।।" तृतीया,पंचमी,षष्ठी,द्वितीया,सप्तमी ये दोनों पक्षोंकी तिथि विशेष कर अत्यन्त उत्तम हैं. शुक्लपक्ष में यज्ञोपवीत करैं तो धर्मकाम सिद्ध होतें हैं,और कृष्णपक्षकी प्रतिपदा और शुक्लपक्षकी त्रयोदशीकी भी कोई मुनि इच्छा करतें हैं।" नैमित्तिकमनध्यायं कृष्णे च प्रतिपद्दिनम् । मेखलाबन्धने शस्तं चौलेवेदव्रतेष्वपि।।प्रशस्ता प्रतिपत्कृष्णे न पूर्वा परसंयुता।।प्रशस्ता प्रतिपत्कृष्णे कदाचिच्छुभगे विधौ। चन्द्रेबलयुते लग्नवर्षाणामपि लंघने।।वसिष्ठ।। वसिष्ठजी कहतें हैं कि" कृष्णपक्षकी प्रतिपदाका दिन नैमित्तिक अनध्याय हैं,तो भी यज्ञोपवीत मुण्डन और वेदके व्रतोंमें उत्तम हैं,कृष्णपक्षकी प्रतिपदा उत्तम हैं परंतु अमावास्या और द्वितीयासे युक्त हो तो श्रेष्ठ नहीं हैं.यह भी उस बालकके यज्ञोपवीत में जानना जिस बालकके यज्ञोपवीत का काल बीत गया हो कारण कि-"कदाचित् कृष्णपक्षकी भी प्रतिपदा तब उत्तम हैं जब चन्द्रमा उत्तम हो और लग्न बलवान् हो तथा यज्ञोपवीतके वर्ष बीत गयें हो । "एवं सप्तम्यपि" तस्या गलग्रहत्वोक्तेः।।निर्णयसिन्धौ३।। इस प्रकार सप्तमी के दिन चन्द्र और लग्न बलवान् हो तो ही यज्ञोपवीत के वर्ष बीत जानेपर शुभ हैं क्योंकि सप्तमी गलग्रहतिथि हैं।"शुक्लपक्षः शुभः प्रोक्तः कृष्णश्चान्त्यन्त्रिकं विना। मिथुने संस्थिते भानौ ज्येष्ठ मासो न दोषकृत्।।बृहस्पतिः।। बृहस्पतिका कहना हैं कि सम्पूर्ण शुक्लपक्ष और पिछली पाँच तिथिओं को त्यागकर सम्पूर्ण कृष्णपक्षकी तिथियाँ शुभ हैं । मिथुनके सूर्यमें ज्येष्ठमासका दोष नहीं ।
विनर्तुना वसन्तेन कृष्णपक्षे गलग्रहे। अपराह्णे चोपनीतः पुनः संस्कार मर्हति ।।"अपराह्ण स्त्रिधा विभक्तदिनतृतीयांशः। वसन्ते गलग्रहो न दोषायेत्यर्थः।। नारदः।। नारदजी कहतें हैं कि वसन्तसे पृथक ऋतु कृष्णपक्ष और गलग्रहमें जिसका यज्ञोपवीत संस्कार हो वह पुनः यज्ञोपवीत संस्कार योग्य हैं,दिनके तीसरे भागको अपराह्ण कहा हैं वसंतऋतुमें गलग्रहका दोष नहीं हैं। "कृष्णपक्षे चतुर्थी च सप्तम्यादि दिनत्रयम्। त्रयोदशी चतुष्कं च अष्टावेते गलग्रहाः।।नारदः।। नारदजीका कहना है- कृष्णपक्षकी चौथ और सप्तमीसे तीनदिन तथा त्रयोदशीसे चारदिन यह गलग्रह तिथियाँ हैं।"पापांशकगते चन्द्रे अरिनीचस्थितेपि च। अनध्याये चोपनीतः पुनः संस्कारमर्हति।।अनध्यायस्य पूर्वेद्युस्तस्य चैवापरेहनि। व्रतबन्धं विसर्गं च विद्यारम्भं न कारयेत्।।वसिष्ठः।। वसिष्ठजीने कहा हैं कि पापके नवांशमें चन्द्रमा हो अथवा शत्रूघरका नीचका चन्द्रमा हो अथवा अनध्याय हो ऐसे योगमें जिसका यज्ञोपवीत हुआ हो वह पुनः यज्ञोपवीत संस्कारके योग्य हैं। अनध्यायके अगलेदिन अथवा दूसरादिन यज्ञोपवीत,व्रतविसर्जन और विद्यारम्भ न करना चाहिये ।
ॐस्वस्ति।।पु ह शास्त्री.उमरेठ।। शेष पुनः
षोडशसंस्काराः(यज्ञोपवीतम्)खंड११७~"अष्टाकासु च सर्वासु युगमन्वन्तरादिषु। अनध्यायं प्रकुर्वीत तथा सोपपदास्वपि।। ज्योतिर्निबन्ध।। सम्पूर्ण अष्टका और मन्वन्तरादि तथा सोपपदामें यज्ञोपवीतका अनध्याय करना चाहिये । "सिता ज्येष्ठे द्वितीया च आश्विने दशमी सिता। चतुर्थी द्वादशी माघे एताः सोपपदाः स्मृताः।।स्मृत्यर्थसारे।। स्मृत्यर्थसारमें सोपपदा तिथि यह लिखी हैं कि-ज्येष्ठ शुक्ला द्वितीया,आश्विनशुक्ला दशमी,माघ शुक्ला चतुर्थी और द्वादशी हैं।एवं प्रदोष "षष्ठी च द्वादशी चैव अर्धरात्रोननाडिका। प्रदोषमिह कुर्वित तृतीया तु न यामिका।।गोभिल।। इसी प्रकार प्रदोष को भी छोड़ दै- प्रदोष का स्वरूप गोभिलने बताया हैं कि षष्ठी और द्वादशी ये आधी रातमें एक घडी न्यून हो तो प्रदोष कहतें हैं। "या चैत्र वैशाखसिता तृतीया"माघस्य सप्त्म्यथ फाल्गुनस्य। कृष्णे तृतीयोपनये प्रशस्ता"प्रोक्ता भरद्वाजमुनीन्द्रमुख्यैः।।अत्रापि कृष्ण प्रतिपद्वज्ज्ञेयम्।।व्यासः।। चैत्र और वैशाख की शुक्ला तृतीया और माघ शुक्ला सप्तमी तथा फाल्गुन कृष्णा तृतीया ये तिथियाँ यज्ञोपवीतमें भरद्वाजमुनिराजने श्रेष्ठ कहीं हैं।यहाँ भी कृष्ण प्रतिपदाके तुल्य चन्द्रमाके बलमें ही इनको शुभ जानना।"अनध्याये प्रकुर्वीत यस्तु नैमित्तिको भवेत् । सप्तमी माघशुक्ले तु तृतीया चाक्षया तथा।। बुध त्रयेन्दुवाराश्च शस्तानि व्रतबन्धने।। इति तत्प्रायश्चित्तार्थोपनयनविषयम्।।वृद्धगार्ग्यः।। वृद्धगार्ग्यने यह कहा हैं कि जो कर्म किसी निमित्तसे किया जाय तो उसे अनध्यायमें भी करलेना चाहिये। माघ शुक्ला सप्तमी,अक्षयतृतीया,बुध,गुरु,शुक्र और सोम ये वार यज्ञोपवीतमें उत्तम हैं यह कथन भी तब माने जबकि अतिक्रान्तके प्रायश्चित्त निमित्त यज्ञोपवीत किया जाय कारण कि-"। स्वाध्यायवियुजो वस्राः कृष्णप्रतिपदादयः। प्रायश्चित्त निमित्ते तु मेखलाबन्धने मताः।। गार्ग्यः।।"इति तेनैवोक्तेरिति निरणयामृतकालादर्शौ।। स्वाध्याय(स्व शाखा) से पृथक(अनध्याय)के दिन और कृष्णपक्षकी प्रतिपदा आदि ये उस यज्ञोपवीत में उत्तम हैं,जो प्रायश्चित्त के निमित्त हो यह निर्णय निर्णयामृत और कालादर्शमें भी कहा हैं। " ग्रहे रवीन्द्वोरवनिप्रकम्पे केतुद्गमोल्कापतनादिदोषे। व्रते दशाहानि वदन्ति तज्ज्ञास्त्रयोदशाहानि वदन्ति केचित् ।।गर्गः।। गर्गने लिखा हैं कि सूर और चन्द्रका ग्रहण,भूकंप,केतुताराका उदय,बिजलीका गिरना आदि दोष हो तो यज्ञोपवीतमें ज्योतिषी दशदिनका निषेध कहतें हैंऔर कोई तेरह दिन । "दाहे दिशांचैव धराप्रकम्पे वज्रप्रपाते$थ विदारणे च। केतौ तथोल्कांशुकणप्रपाते त्रयहं न कुर्याद्व्रतमङ्गलानि।।संकटे चण्डेश्वरः।। जननाशौच,मृताशौच तथा रजस्वलादि आशंकाका संकट हो तो चंडेश्वरने कहा हैं कि दिशाओंका दाह,भूकंप,वज्रपात,राजयुद्ध,केतोदय,और बिजली गिरना इनमें तीन दिनतक यज्ञोपवीत और मंगलकार्यों न करैं ।**" वेदव्रतोपनयने स्वाध्यायाध्ययने तथा। न दोषो यजुषां सोपपदास्वध्ययनेपि च ।।चंडेश्वरः।। यजुर्वेदियोंको सोपपदा और अनध्यायका दोष वेदव्रत और यज्ञोपवीत तथा वेदपाठमें नहीं हैं। ***" हस्तत्रये पुष्यधनिष्ठयोश्च पौष्णाश्विसौम्यादितिविष्णुभेषु । शस्ते तिथौ चन्द्रबलेन युक्ते कार्यौ द्विजानां व्रतबन्धमोक्षौ ।। हेमाद्रौ ज्योतिषे।। हेमाद्रीमें ज्योतिष का कथन हैं कि हस्तसे तीन,पुष्य,धनिष्ठा,रेवती,अश्विनी,मृगशिर्ष,पुनर्वसु,श्रवणमें और चन्द्रके बलसे युक्त श्रेष्ठ तिथिमें द्विजातियोंका यज्ञोपवीत और व्रतविसर्ग करने चाहिये।"श्रेष्ठान्त्यर्कत्रयान्त्येज्यचन्द्रादित्युत्तराणि च। विष्णुत्रयाश्विमित्राब्जयोनिभान्युपनायने।।ज्योतिर्निबन्धे नारदः।। हस्तसे तीन,रेवती,पुष्य,पुनर्वसु तीनों उत्तरा,श्रवणसे तीन अश्विनी,अनुराधा,भरणी ये नक्षत्र यज्ञोपवीतमें उत्तम हैं।"त्रिषूत्तरेषु रोहिण्यां हस्ते मैत्रे च वासवे। त्वाष्ट्रे सौम्यपुनर्वस्वोरुत्तमं द्युपनायनम्।।बृहस्पतिः।। बृहस्पतिजी का कहना हैं कि तीनों उत्तरा,रोहिणी,हस्त,अनुराधा,धनिष्ठा,चित्रा,मृगशिर्ष और पुनर्वसु यज्ञोपवीतमें श्रेष्ठ हैं।
ॐस्वस्ति।।पु ह शास्त्री.उमरेठ।। शेष पुनः
षोडशसंस्काराः(यज्ञोपवीतम्)खंड११८~"पूर्वाहस्तत्रये सार्पश्रुतिमूलेषु बह्वृचाम्। यजुषां पौष्णमैत्रार्कादित्य पुष्यमृदुध्रुवैः।।सामगानां हरीशार्कवसुपुष्योत्तराश्विभैः।धनिष्ठादितिमैत्रार्केष्विन्दु पौष्णेष्वथर्वणाम्।।ज्योतिर्निबन्धे।। ज्योतिर्निबन्धमें कहा हैं कि तीनोंपूर्वा,और हस्तसे तीन नक्षत्र,आश्लेषा,श्रवण,मूलमें ऋग्वेदियोंका,रेवती,अनुराधा,हस्त,और पुनर्वसु मृदुसंज्ञक(मृगशिर्ष,चित्रा,अनुराधा,रेवती),और ध्रुवसंज्ञक(रोहिणी,उत्तरातीन)नक्षत्रोंमें यजुर्वेदियोंका,श्रवण, आर्द्रा,हस्त,धनिष्ठा,पुष्य,तीनों उत्तरा और अश्विनीमें सामवेदियोंका, तथा धनिष्ठा,पुनर्वसु,अनुराधा,हस्त, मृगशिर, रेवतीमें अथर्ववेदियोंका यज्ञोपवीत करना उत्तम हैं।"ब्राह्मणस्य पुनर्वसुं निषेधयति-" ताराचन्द्रानुकुलेषु ग्रहाब्देषु शुभेष्वपि। पुनर्वसौ कृतौ विप्रः पुनः संस्कार मर्हति।।राजमार्तण्डे।। राजमार्तण्डमें पुनर्वसुका निषेध लिखा हैं कि- तारा और चन्द्रमा अनुकूल हों और ग्रह तथा वर्ष शुभ हो तो भी पुनर्वसुमें यज्ञपवीत किया हुआ ब्राह्मण फिर संस्कारके योग्य हैं।"सर्वेषां जीव शुक्रज्ञवाराः प्रोक्ता व्रते शुभाः। चन्द्रार्कौ मध्यमौ ज्ञेयौ सामबाहुजयोःकुजः।।शाखाधिपति वारश्च शाखाधिपबलं तथा। शाखाधिपतिलग्नं च दुर्लभं त्रितयं व्रते।।नारदः।। नारदने कहा हैं कि गुरु,शुक्र,बुधवार सबके यज्ञोपवीतमें उत्तम हैं। सोम और रविवार मध्यम, तथा वैश्य और क्षत्रियको मंगलवार उत्तम हैं। शाखाके स्वामीका वार और शाखाके स्वामीका बल तथा शाखाके स्वामीका लग्न ये तीन यज्ञोपवीतमें दुर्लभ हैं।" ऋगथर्वसामयजुषामधिपा गुरुसौम्यभौमसिताः। जीवसितौ विप्राणां क्षत्रस्यारोष्णगू विशां चन्द्रः।।रत्नसंग्रहे।। ऋग्वेदियों का गुरु,सामवेदियों का बुध, अथर्ववेदियों का मंगल,और यजुर्वेदियोंका शुक्र शाखाके स्वामी हैं।गुरु और शुक्र ब्राह्मणोंके, क्षत्रियोंके मंगल और सूर्य, तथा वैश्योंके चन्द्रमा वर्णेश हैं । "बह्वृचानां गुरोर्वारे यजुर्वेदजुषांबुधे। सामगानां धरासूनोरथवा विदूषां रवेः।।बृहस्पतिः।। पारिजातमें बृहस्पतिने कहा हैं कि ऋग्वेदियोंका गुरुवार,यजुर्वेदियोंका बुधवार, सामवेदियोंका मंगलवार, तथा अथर्ववेदियोंका रविवार होता हैं।"{व्रतेह्नि पूर्वसंध्यायां वारिदो यदि गर्जति। तद्दिने स्यादनध्यायो व्रतं तत्र विवर्जयेत् ।।लल्लः।। वेदव्रत के दिन यदि पूर्वसंध्यामें मेघ गर्जे तो अनध्याय हो जाता हैं। इससे उसमें वेदव्रतको त्याग देना चाहिये। क्योकि "नान्दीश्राद्धं कृतं चेत्स्यादन ध्यायस्त्वकालिकः। तदोपनयनं कार्यं वेदारम्भं न कारयेत्।।ज्योतिर्निबन्ध।। यदि नान्दीश्राद्ध करनेके बाद अकालिक अनध्याय हो जाय तो उपनयन कर लेना और वेदारंभ नहीं करना चाहिये। क्योंकि ऋग्वेदियोंका अनध्यायमें वेदारंभ नहीं होता ।"मृगादिज्येष्ठान्तंवर्षतुः। तं विना वर्षादौ त्रिरात्रमनध्यायः।ऐतरेयोपनिषदि।। ऐतरेय उपनिषदमें कहा हैं कि मृगशिरसे ज्येष्ठाके सूर्य तक वर्षाऋतु हैं उसके बिना वर्षाऋतुमें तीन रात्रिका अनध्याय हैं। "एतच्च प्रातस्तनिते सायंस्तनिते तु दिवैव चरुं श्रपयित्वा सायंसंध्योत्तरं होमं कुर्यात्।"न संध्यागर्जिते काले न वृष्ट्युत्पातदूषिते। ब्रह्मौदनं पचेदग्नौ पक्वं चेन्न निवर्तते।।प्रयोगरत्ने।। यह कहैं वाक्य प्रातःकालके गर्जनके विषयमें हैं,यदि सायंसंध्यामें गर्जेतो दिनमें पकाये हुए चरुका सायंकाल के बाद हवन करलैं, कारण कि-"प्रयोगरत्नमें लिखा हैं कि संध्याके समय गर्जनेनें और बिजली आदिके उत्पत्तिमें ब्रह्मौदनचरु अग्निमें नहीं पकाना चाहिये।
ॐस्वस्ति। पु ह शास्त्री.उमरेठ।शेष पुनः
षोडश संस्काराः(यज्ञोपवीतम्)खंड११९~" पिता पितामहो भ्राता ज्ञातयो गोत्रजाग्रजाः। उपानये$धिकारी स्यात्पूर्वाभावे परःपरः।।माधवीये मनुः।। उपनयन करानेमें अधिकारी माधवीय ग्रन्थमें मनूने कहैं हैं कि पिता,दादा(पिताके पिता),भाई,जातिके मनुष्य, सगोत्री,और ब्राह्मण यज्ञोपवीत करानेके अधिकारी हैं।इनमें अनुक्रमसे पहले कहे हुए का किसीतरहसे लाभ न हो तो पीछलें अनुक्रमसे आगेके लाभ न होने पर ग्राह्य हैं जैसेकि पिता न होने पर दादा, और पिता तथा दादा न होनेपर भाई इत्यादि।प्रयोग रत्नमें भी कहा हैं कि "पितेवोपनयेत्पुत्रं तदभावे पितुः पिता। तदभावे पितुर्भ्राता तदभावे तु सोदरः।।प्रयोगरत्ने।। पिता ही पुत्रका यज्ञोपवीत करायें,वह न हो तो पितामह(दादा),और उसके अभावमें चाचा,यदि चाचा न हो तो सगाभाई यज्ञोपवीत करायें। "पितेतिविप्रपरं न क्षत्रियादेः। तेषां पुरोहित एव। उपनयनस्य दृष्टार्थत्वात्। असंस्कृतास्तु संस्कार्या भ्रातृभिः पूर्वसंस्कृतैः।।याज्ञवल्क्यः।। पिता सिर्फ ब्राह्मणोंके यज्ञोपवीत के लिये निमित्त हैं। क्षत्रियादिको नहीं। कारण कि उपनयन का दृष्टार्थ इस लोगों के होनेसे पुरोहित ही अधिकारी हैं। क्षत्रियादिकोंका वेदके पढानेमें अधिकार नहीं हैं और यहाँ चाचा भी ज्येष्ठभाईके न होनेमें ही अधिकार हैं। कारणकि याज्ञ्यवल्क्यने कहा हैं कि जिन भाईओंका संस्कार नहीं हुआ उनका प्रथम संस्कृत भाई संस्कार करैं।" अलाभे सुमुर्हूतस्य रजोदोषे ह्युपस्थिते। श्रियं संपूज्य विधिवत्ततो मङ्गलमारभेत्।।वाक्यसारे।। वाक्य सारमें लिखा हैं कि मुर्हूत न मिलै और रजोदोष हो जाय तो विधिसे लक्ष्मीका पूजन (श्रीशांति)करवाकर मङ्गलकार्य करैं।"संकटे समनुप्राप्ते सूतके समुपागते। कूष्माण्डाभिर्घृतं हुत्वा गां च दद्यात्पयस्विनीम्।।संग्रहे।। आशौच हो जाय तो "संग्रह"में कहा हैं कि रजोदोषकी संभवना,सूतक या मृतक आशौच में कूष्माण्डी ऋचा(मंत्रो)से घीका हवन कर दूधदेनेवाली गाय या गायके बदलेमें निष्क्रयी दक्षिणा दान दैं।"चूडोपनयनोद्वाह प्रतिष्ठादिकमाचरेत्।।यह होम करकें चूडाकरण,यज्ञोपवीत,विवाह,प्रतिष्ठा,आदि कर सकतें हैं। प्रयोग पारिजातमें ब्रह्मपुराणका कथन हैं कि-" ब्राह्मण्यां ब्राह्मणाज्जातो ब्राह्मणः स इति श्रृतिः। तस्माच्च षण्ढबधिरकुब्जवामनपंगुषु। जडगद्गदरोगार्त शुष्काङ्गविकलाङ्गिषु। मत्तोन्मत्तेषु मूकेषु शयनस्थे निरिन्द्रिये।। ध्वस्त पुंस्त्वेषु चैतेषु संस्काराः स्युर्यथोचितम्। मत्तोन्मत्तौ न संस्कार्याविति केचित्प्रचक्षते।।कर्मस्वनधिकाराच्च पातित्यं नास्ति चैतयोः।तदपत्यं च संस्कारर्यमपरे त्वाहुरन्यथा।। संस्कारमन्त्र होमादीन्करोत्याचार्य एव तु। उपनेयांश्च विधिवदाचार्यस्य समीपतः। आनियाग्नि समीपं वा सावित्रीं स्पृश्य वा जपेत्। कन्यास्वीकरणादन्यत्सर्वं विप्रेण कारयेत्।।।।ब्राह्मे।। ब्राह्मणोंमें जो ब्राह्मणसे उत्पन्न होता हैं वह ब्राह्मण होता हैं,यह श्रृति है। उससे उत्पन्न हुये नपुंसक,बहरे,कुबडे,नाटे,लंगडे,जड,तोतडे, रोगी,शुष्क और विकलांग हैं तथा मत्त उन्मत्त ,गूंगे अथवा निद्रालु और इन्द्रियरहित या पुंस्त्वहिन हो गयें हैं उनका भी यथोचित संस्कार करना चाहिये। कोई कहतें हैं कि मत्त और उन्मत्त ये दोनोंका संस्कार न करैं। ये दोनौं पतित तो नहीं हैं परंतु इनका कर्म में अधिकार नहीं। उनकी सन्तान संस्कार करने योग्य हैं। किसीका कहना हैं कि उनके संस्कार होम आदि आचार्यको करने चाहिये। यज्ञोपवीत करने योग्य नपुंसक आदिको आचार्य विधिसे अपने निकट लाकर और अग्निके पास बैठाकर और स्पर्श करके गायत्रीमंत्रका जप करैं। गर्भाधान,कन्यादान स्विकार करनेसे भिन्न कर्मको आचार्य करैं । "आरभ्याधानमाचौलात्काले$तीते तु कर्मणाम्। व्याहृत्याग्निं तु संस्कृत्य हुत्वा कर्म यथाक्रमम्।।एतेष्वेकैकलोपे तु पादकृच्छ्रं समाचरेत्। चूडायामर्धकृच्छ्रं स्यादापदि त्वेवमीरितम्।।अनापदि तु सर्वत्र द्विगुणं द्विगुणं चरेत् ।।शौनकः।। संस्कारके लोपमें शौनकजीने कहा हैं कि गर्भाधानसे लेकर मुण्डनपर्यन्त संस्कारकाल बीतजाय तो व्याहृतिमंत्रोंसे घीका संस्कार और हवन करकें क्रमसे कर्म करैं। यदि इनमें एक दो कर्मका लोप हो तो पादकृच्छ्र व्रत या उनके प्रत्याम्नायरूप १०००गायत्रीमंत्रजप करैं मुण्डनके लोपमें अर्धकृच्छ्रव्रत या २००० गायत्री जप करैं,यह आपत्ति के लिये लिखा हैं परंतु लोकलज्जा तथा समय बचाने पैसे बचाने के लिये सभी संस्कार साथमें करनें पडैं तो सब कर्मका दोगुना प्रायश्चित्त यानी गर्भाधानके १०००के दोगुनेेमैं २०००/ पुंसवनके १०००के दोगुने २०००/ सीमंतके १०००के दोगुने २०००/ जातकर्मके१०००के दोगुनेे २०००/ नामकरणके १०००के दोगुने २०००/ निष्क्रमणके १०००के दोगुने२०००/ अन्नप्राशन१०००के दोगुने २०००/ चूडाकरण के २०००के दोगुने ४००० कुल १८००० गायत्री जप हौंगे। आगे यज्ञोपवीतमें आनेवाले प्रायश्चित्त कहैंगे । "कालातीतेषु कार्येषु प्राप्तवत्स्वपरेषु च । कालातीतानि कृत्वैव विदध्यादुत्तराणि तु।। तत्र सर्वेषां तन्त्रेण नान्दीश्राद्धं कुर्यात्। गणशःक्रियमाणानां मातॄणां पूजनं सकृत् | सकृदेव भवेच्छ्राद्धमादौ न पृथगादिषु || छन्दोग्यपरिशिष्टात्|| त्रिकाण्डमण्डनमें कहा हैं कि सभी लोप कर्म करने हो तथा समयोचितभी कर्म साथमें करना हो तो उन लोप कर्मोंको प्रथम क्रमसे करकर समयोचित कर्मोंको करैं | वहाँ सब कर्मोंका एकतन्त्रसे ही नान्दीश्राद्ध करैं,कारण कि देशकालमें करने वालें यह सब कर्म एक ही कहा जायेंगा | छंदोगपरिशिष्टमें कहा हैं कि एकवार किये हुए कर्मोंमें षोडशमातृका(वसोर्द्धारासहिता)माताओंका पूजन और श्राद्ध एक बार ही पहले कर लैं भिन्न न करैं कारण कि देशकाल करनेसे यह सब एक हैं |
ॐस्वस्ति| पु ह शास्त्री. उमरेठ| शेष पुनः
षोडश संस्काराः(यज्ञोपवीतम्)खंड१२०~" पतिके जीते हुये जारसे उत्पन्न बालक कुण्ड तथा मरजानेके बाद जारसे उत्पन्न बालक गोलक हैं। "अब्राह्मण्येनोपनयनाद्यप्राप्तेरित्यपरार्कः।। और यह कुण्ड तथा गोलक ब्राह्मण न होनेसे यज्ञोपवीतकी प्राप्ति ही नहीं होती ऐसा अपरार्कमें लिखा हैं। "उपनयनं च कुमारं भोजयित्वा कार्यम्। प्रागेवैनं तदहर्भोजयन्ति।। मदनपारिजाते गोभिलः।। यज्ञोपवीत कुमारको भोजन कराकर करना,कारण कि मदन पारिजातमें गोभिलने कहा हैं कि यज्ञोपवीतमें बालकको पहले ही(दूधभात) भोजन करायैं। यावद्ब्रह्मोपदेशस्तु तावत्संध्यादिकं च न । ततो मध्याह्न संध्यादि सर्वं कर्म समाचरेत् ।।जैमिनिः।। यज्ञोपवीतके दिन पारिजातमें जैमिनि मध्याह्न संध्या करने कहतें हैं - कि जबतक गायत्रीका उपदेश न हो तबतक सन्ध्यादि न करैं बादमें मध्याह्न संध्यादि सब कर्मोंको करैं। यज्ञोपवीतमें बटुकको भी जिस संध्याके निकटमें हो उस संध्या (संक्षिप्त विधानसेभी)आचार्य करायें क्योंकी यहाँ बटुकको यज्ञोपवीतसंस्कारसे ही तो आचार और अनुष्ठनीय कर्मको जानना हैं ।" उपनयनाग्निस्त्रिरात्रं धार्यः।।आपस्तम्ब।। उपनयनकी अग्नि बटुक तीन रात तक धारण करके सायंप्रातःअग्निकार्य भी आचार्यसे जानकर करैं। "बौधायनसूत्रे तु सदा धारणमप्युक्तम्। उपनयनादिरग्निष्टोमोपासनमित्याचक्षते। पाणिग्रहणादित्येके। नित्यो धार्योनुगतो निर्मन्थ्यःइति।। बौधायनसूत्रमें तो यह अग्नि निरन्तर रक्षणकरकें धारण करना भी लिखा हैं। किसीका कथन हैं कि उपनयनकी अग्निको उपासनाअग्नि कहतें हैं,उसको विवाहतक धारण करैं। कारण कि यह कहा हैं कि मथी हुई अग्निको नित्य धारण करैं और साथ रखैं यह भी जो अरणीसे उत्पन्न हुई अग्निके विषयमें कहा हैं। सामन्य अग्निको मथना तो असम्भव हैं। अथब्रह्मचारि धर्माः-" मधुमांसञ्जनोच्छिष्ट शुक्तस्त्रीप्राणिहिंसनम्। भास्करालोकनाश्लीलपरिवादादि वर्जयेत्।।याज्ञ्यवल्क्यः।। याज्ञवल्क्यने कहा हैं कि शहद,मांस,अंजन,उच्छिष्ट,शुक्तपदार्थ,स्त्री,प्राणियोंकी हिंसा,सूर्यदर्शन(त्राटक), अस्तहोनेवाले सूर्यका दर्शन, कठोरवाक्य,निन्दा,ब्रह्मचारी सदा त्याग दैं।"अभ्यङ्गमञ्जनं चाक्ष्णोरुपानच्छत्रधारणम्। वर्जयेदिति प्रकृतम्।।मनुः।। मनुजीने कहा हैं कि उबटन,नेत्रोंका अञ्जन,जूता,और छत्रधारण त्याग दैं।"ताम्बूलाभ्यञ्जनं चैव कांस्यपात्रे च भोजनम्। यतिश्च ब्रह्मचारी च विधवा च विवर्जयेत् ।।प्रचेताः।। प्रचेता का कबना हैं- पान चबाना,कांसीकेपात्रमें भोजन करना,इनको संन्यासी,ब्रह्मचारी और विधवा त्याग दैं। "मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं च नित्यशः। कौपीनं कटिसूत्रं च ब्रह्मचारी तु धारयेत् ।।अग्नीन्धनं भैक्षचर्य्यामधःशय्यां गुरोर्हितम्। कुर्यादिति शेषः।।यमः।। यमने कहा हैं कि मेखला,मृगचर्म,दण्ड,यज्ञोपवीत, कौपीन,और कटिसूत्रको ब्रह्मचारी निरन्तर धारण करैं। तथा अग्निके निमित्त ईंधन,और भिक्षा लायें,गुरुसे नीचे सोना चाहिये गुरुका हित करैं।। गायत्र्युपदेशश्चोत्तरतोग्नेःकार्यः।।उत्तरेणाग्निमुपविशतः। प्राङ्गमुख आचार्यःप्रतयङ्गमुख इतरो$धीहि भोः।।इति शांखायनसूत्रोक्तेः।। गायत्रीका उपदेश अग्निसे उत्तरदिशामें करैं,कारण कि शांखायनसूत्रमें कहा हैं कि "अग्निसे उत्तरमें बैठे हुये पश्चिमाभिमुख बालकको पूर्वमें बैठा हुआ आचार्य यह कहैं "भो बटो!अध्ययन करो,।"तथास्मै सावित्रीमन्वाहोत्तरतोग्नेः प्रत्यङ्गमुखाय इति।।कात्यायन।। कात्यायनने कहा हैं कि बटुको गायत्रीका उपदेश अग्निसे उत्तरमें पश्चिमाभिमुख बैठे हुएको करैं।"बह्वृचानां तूत्तर एव वेदैक्यात्।।नि०सिं०।। ऋग्विदियोंको उत्तरमें ही उपदेश करैं कारण कि उनका एक ही वेद हैं।
ॐस्वस्ति।।पु ह शास्त्री.उमरेठ।। शेष पुनः
षोडश संस्काराः(यज्ञोपवीतम्)खंड१२१~ " मेखला मौञ्जी ब्राह्मणस्य धनुर्ज्या क्षत्रियस्यावी वैश्यस्य।।आश्वालायन।। आश्वालायन ऋषिने कहा हैं कि ब्राह्मणकी मुञ्जकी,क्षत्रीयकी धनुषके प्रत्यंचाकी (मोरवेलके रेसे से निर्मित),और वैश्यकी भेडके उन की मेखला होती हैं।" त्रिवृता मेखला कार्या त्रिवारं स्यात्समावृता। तद्ग्रन्थयस्त्रयः कार्याः पञ्च वा स्प्त वा पुनः।।"
तीनसूतकी मेखला निर्माण करैं,फिर उसको तीन तारकी बनाकर इसमें तीन, एक,पाँच गाँठ लगायैं। "अत्र प्रवर संख्या नियमः।।" यह गाँठ अपने अपने प्रवर की संख्यानुसार चयन करैं।" मौंज्याभावे तु कर्तव्या कुशाश्मन्तकवल्वजैः।।मनुः।। मनुजीने कहा हैं कि मौञ्जी न मिलैं तो कुश,अश्मन्तक(धानके पत्ते),वल्वज(मोळ)की मेखला बनायैं।" ब्राह्मणो बैल्वपालाशौ क्षत्रियो वाटखादिरौ। पैलवोदुम्बरो वैश्यो दण्डानर्हन्ति धर्मतः।।मनुस्मृतिः२/४५।। मनुजी कहतें हैं- धर्मशास्त्रानुसार ब्राह्मण बेल और ढाक का,क्षत्रिय वट और खैर का तथा वैश्य पीपल और गूलरका दण्ड धारण करैं।"एषामभावे- यज्ञियो वा।।गौतमः।। कहे हुए दण्ड न मिलने पर महर्षि गौतमने कहा हैं कि सबका दण्ड यज्ञीय वृक्षके निर्माण करैं। "केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यःप्रमाणतः। ललाटसंमितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः।।मनुः।। ब्राह्मणका दण्ड बटुककी शिखा तक पहुचे इतना,क्षत्रियका ललाट तकका,और वैश्यका नाकके अग्रभाग तक आयें इतना दण्ड रखैं।"अहतेन वाससा संवीतमैणेयेन वाजिनेन ब्राह्मणं रौरवेण क्षत्रियमाजेन वैश्यम्।।आश्वालायन।। आश्वालायनने कहा हैं कि नवीन वस्त्रसे ढके ब्राह्मणका चर्म कालीमृगीका होता हैं,क्षत्रियका रुरुमृगका, और वैश्यका बकरेका चर्म होता हैं। "सर्वेषां वा रौरवम्।। शंखः।। अथवा न मिलनेपर सबका रुरुमृगका चर्म शंखने कहा हैं।"मृग चर्मणा सह विकल्पो ज्ञेयः।। यमः।। यमके वाक्यसे मृगचर्म के साथ ब्राह्मणके लिये मृगीचर्म का विकल्प समझे। "उपवीतं बटोरेकं द्वे तथेतरयोःस्मृतेः। एकमेव यतीनां स्यादिति शास्त्रस्य निश्चयः।।देवलः।। पारिजातमें देवलने कहा हैं कि ब्रह्मचारीका यज्ञोपवीत एक,वानप्रस्थ और गृहस्थीके दो,तथा संन्यासियोंका एक होता हैं यह शास्त्रका सिद्धान्त हैं।" बहूनिषायुष्कामस्य।।देवल।। देवलने यह भी कहा हैं कि आयुष्यकी कामनासे बहुतसे यज्ञोपवीत धारण करैं।"यज्ञोपवीते द्वे धार्ये श्रौते स्मार्ते च कर्मणि। तृतीयमुत्तरीयार्थे वस्त्राभावे तदिष्यते।।हेमाद्रौ।। हेमाद्रीका कथन हैं कि वेद और स्मृतिमें कहे कर्मोंमे दो यज्ञोपवीत धारण करैं और उपवस्त्र के निमित्त तीसरा धारण करैं परन्तु वस्त्रके न पहननेमें ही वह पहनें अन्यथा नहीं।"विच्छिन्नं चाप्यधो यातं भुक्त्वा निर्मितमुत्सृजेत्।।देवलः।। यदि यज्ञोपवीत तूट जायें(तार भी), नाभिसे निचे निकल जायें अथवा भोजन करके जो यज्ञोपवीतका निर्माण किया हो उसको त्याग दैं। "मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम्।अप्सु प्रास्य विनष्टानि गृह्णीतान्यानि मन्त्रतः।।मनुः।। मनुजीने कहा हैं कि मेखला,मृगचर्म,दण्ड,यज्ञोपवीत,कमण्डलु टूटजाये तो जलमें डालकर मन्त्रपूर्वक नयें धारण करैं।
ॐस्वस्ति।। पु ह शास्त्री.उमरेठ। शेष पुन
षोडशसंस्काराः(यज्ञोपवीतम्)खंड१२२~"आयुष्यं प्राङ्गमुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः। श्रियं प्रत्यङ्गमुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते ह्युदङ्मुखः।।मनुः२/५२।। लंबे आयुष्यकी ईच्छावालेको पूर्वाभिमुख,यशकी ईच्छासे दक्षिणाभिमुख,लक्ष्मीकी ईच्छासे पश्चिमाभिमुख और सत्यकी ईच्छासे उत्तराभिमुख भोजन करैं।" सायं प्रातर्द्विजातीनामशनं स्मृतिनोदितम्। नान्तरे भोजनं कुर्यादग्निहोत्रसमो विधिः।।" द्विजोंके लिये स्मृतिशास्त्रमें सायंकाल और सुबह भोजन करना कहा हैं,इस लिये बिचमें भोजन नहीं करना चाहिये;क्योंकि यह अग्निहोत्र जैसी विधि हैं। "उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः। भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत्।।मनुः२/५३।। द्विज; नित्य सावधान रहकर आचमन करकें स्वस्थ चित्तसे भोजन करैं। भोजनके बाद रितिसे आचमन करैं और जलसे नेत्र आदि इंद्रियोंका स्पर्श करैं(प्रक्षाल्य हस्तौ पादौ च त्रिःपिबेदम्बुवीक्षितम्।गौतमः।।" भोजनके बाद हाथ पैर धोकर तीनबार देखा हुआ शुद्ध जल पीयें तथा नाक,आँख,और कान का जलसे स्पर्श करैं।"पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन्। दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः।। सर्व प्रकारकें अन्नकी नित्य इस तरह "अन्नं विष्णुःस्वयं प्राह प्राणार्थं मां सदा ध्यायेत् स मां संपूजयेत् सदा। अनिन्दँश्चैतदद्यात्तु दृष्ट्वा हृष्येत् प्रसीदेच्च।।आदिपुराण।। अन्न विष्णुस्वरूप हैं,ऐसा भगवानने स्वयं कहा हैं;प्राणके रक्षण के लिये अन्नका विष्णुस्वरूपसे ध्यान करैं;और इस तरह विष्णुस्वरूपसे अन्नका नित्य पूजन(सत्कार)करैं;अन्नकी निंदा किये बिना भोजन करैं और अनन्नके दर्शन करकें प्रसन्न होकर सर्वदा अन्न हमें मिला करौं ऐसे दौनो हाथ से वंदन करकें भोजन करैं। "पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जं च यच्छति। अपूजितं तु तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम्।।मनुः२/५५।। सत्कार किया हुआ अन्न नित्य बल और ऊर्जा देता हैं परंतु बिना सत्कार किये हुए अन्न खाने से इन दोनोंको नाश कर देता हैं।
" लशुनं गृञ्जनं जग्ध्वा पलाण्डुं च तथा शुनम् । उष्ट्रमानुषकेभाश्वरासभीक्षीरभोजनात्।। उपानयं पुनः कुर्यात्तप्तकृच्छ्रं चरेन्मुहुः।।शातातपः।।"शातातपने पारिजातमें कहा हैं कि लहसुन, गाजर, सलगम, खानेवाला और कुत्ती,ऊंटनी, मनुष्यस्त्री, हथिनी, घोडी, गधी इन सबके दूधको पीनेवाला फिर यज्ञोपवीत संस्कार योग्य हैं। तथा वारं वार तप्तकृच्छ्र व्रत तो करैं ही। "जीवन्यदि समागच्छेद्घृतकुम्भे निमज्ज्य च। उद्धृत्य स्नापयित्वास्य जातकर्मादि कारयेत्।।हेमाद्रौ मनुः।।" मरने के बाद मनुष्य फिर जीवता आ जाय तो घी भरे घडें में डूबकी लगाकर और स्नान करके इसके जातकर्म आदि संस्कार करैं(अर्थात् जिस संस्कारमें प्रवेश कर चूंका हो तबतककें मृतिसंस्कार के बिना सब संस्कार करैं)। " प्रेतशय्या प्रतिग्राही पुनः संस्कारमर्हति।। पाद्मे।। पद्मपुराणमें लिखा हैं कि प्रेतशय्याका प्रतिग्रह(ग्रहण)करनेवाला फिर यज्ञोपवीत संस्कारके योग्य हैं। "खरमुष्ट्रञ्च महिषमनड्वाहमजं तथा। बस्तमारुह्य मुखजः क्रोशे चान्द्रं विनर्दिशेत्।। गौतमः।।"गौतमका वाक्य हैं कि जो ब्राह्मण!गर्दभ,उंट, भैंसा, बैल, बकरा, तथा मेढेपर कोशभर चढकर चलें तो चांद्रायण करैं। "खरमारुह्य विप्रस्तु योजनं यदि गच्छति। तप्तकृच्छ्रत्रयं प्रोक्तं शरीरस्य विशोधनम्।।मार्कण्डेय।। मार्कण्डेयने कहा हैं- यदि ब्राह्मण!गधेपर सवारीकर योजनभर चलें तो तीन तप्तकृच्छ्रसे उसका शरीर शुद्ध होता हैं। पुनर्जन्म प्रकुर्वीत घृतगर्भ विधानतः।। " तथा घीभरे घडेमें डूबकी लगाकर फिर जन्मसंस्कार करैं।" अज्ञानात्प्राश्य विण्मूत्रं सुरासंसृष्टमेव च। पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः।। मनुः।। मनुजी कहतें हैं कि तीनों द्विजातिवर्ण;अज्ञानसे विष्ठा मूत्र और मदिरामिश्रित वस्तु खाकर फिर यज्ञोपवीत संस्कार योग्य हैं। वपनं दक्षिणादानं मेखला दण्डमजिन भैक्ष्यचर्या व्रतानि च निवर्तन्ते पुनः संस्कार कर्मणि।। " द्विजातियोंके पुनः यज्ञोपवीत संस्कारमें मुंडन, मेखलादान,मृगचर्म, भिक्षाटन व्रत नहीं होतें।"अजिनं मेखला दंडो भैक्ष्यचर्यो व्रतानि च। निवर्तन्ते द्विजातीनां पुनः संस्कार कर्मणि।।पराशर।। द्विजातियोंको मृगचर्म,मेखला,दंड, भिक्षाचरण, व्रतादेश(गायत्रीउपदेश) पुनः यज्ञोपवीतमें नहीं होता। "पित्रादिव्यतिरेकेन ब्रह्मचारिणः प्रेतकर्मकरणे"(अंत्येष्ठी समारभ्य यावत् सपिंडीकरणेषु)"पुनरुपनयनमित्यपरार्कादयः।। आश्वालायन गृह्यसू।।"पिता आदि(दश पैढी तक)से भिन्नका यदि प्रेतकर्म ब्रह्मचारी करैं तो पुनः यज्ञोपवीतके योग्य होता हैं यह अपरार्क आदिने कहा हैं।
ॐस्वस्ति।। पु ह शास्त्री.उमरेठ।। शेष पुनः
षोडश संस्काराः खंड १२३(यज्ञोपवीतम्)~ यज्ञोपवीत-संस्कारमें बटुके देहको ढँकनेके लिये मृगचर्म,कटिमें मुञ्जमेखला और दाहिने हाथमें दण्ड दिया जाता हैं। इन वस्तुओंके धारण करनेका अर्थ हैं -देहकी रक्षा करते हुए दृढ निश्चयसे मनको नियन्त्रित रखते(ब्रह्मचर्यव्रत पालन करते) हुए वेदविद्या प्राप्त करना। आगे- आचार्य!विशेष विधिसे "गायत्रीमंत्रका उपदेश (दिक्षा) बटुको प्रदान करतें हैं। इसके बाद अग्निके उत्तरकी और आचार्य पूर्वाभिमुख बैठकर अपने समक्ष बटुको बैठाकर आचार्य अपने हाथोंकी अञ्जलि बनातें हैं और बटु भी वैसी अञ्जलि बना करके आचार्यकी अञ्जलिके नीचे रखता हैं। आचार्य अपनी अञ्जलिमें भरा हुआ जल थोड़ा थोडा़ बटुकी अञ्जलिमें गिराते रहतें हैं और सूर्यनारायणको अर्घ्य दिलवातें हैं। इस क्रिया का अर्थ यह हैं कि आचार्य अपनी सम्पूर्ण विद्या इस प्रकार शिष्य-बटुको प्रदान करैंगे। परंतु इस समयमें यज्ञोपवीत-संस्कारके बाद मोर्डन ज़मानेके माता-पिता! वेदज्ञान,संस्कृतिकी सुरक्षा के लिये तनीक भी नहीं सोंचतें हैं कि "हम ऋषिकुल परम्पराके" अंशज हैं और हमारा यह कर्तव्य हैं कि हम माता-पिता अपने बालकको अपने धर्मके,अपने वर्णकी उच्चतम शिक्षा प्रदान करवाने के लिये अपने बालकको वैदिक गुरुकुलमें भैजें। आचार्योंने तो कहा हैं कि " माता शत्रु पिता वैरी येन बालो न पाठितः। न शोभते सभा मध्ये हंस मध्ये बको यथा।।" जो भी माता-पिता अपने बालकों को अपने वर्णानुसार उच्चतम शिक्षा दिलवानेके लिये वर्णविशेष-गुरुकुल में पढ़ने नहीं भेज सकतें वह माता-पिता बालकके उद्धारमें बाधकबनकर शत्रु हैं। जैसे हंसके समुदायमें बगुला शोभा नहीं पाता ठीक वैसे वर्णानुसार शिक्षा न पाकर अपने वर्णके समुदायमें श्रेष्ठता नहीं पाता। भले ही वह किसीभी वर्णके शिक्षकसे वर्तमानकी उच्चतम शिक्षा प्राप्त करलें।
आगे इस संस्कारमें आचार्य बटुका दक्षिण कर ग्रहण करकें उससे कहतें हैं-सविता ने तेरा हाथ पकड़ा हैं,अग्नि तेरा आचार्य हैं। इस कथनका गूढार्थ यह हैं कि आचार्य यज्ञोपवीतधारी बटुको अपने साथ आश्रममें ले जायँगे और वहाँपर रखकर उसे वेदविद्या सिखायेंगे। यह वेदविद्या परमात्मा आदित्य एवं अग्निसे ही(उन देवताकी कृपासे ही)बटुको प्राप्त करनी हैं। इस क्रियाके बाद आचार्य बटुको आदित्य(सूर्य)के सामने देखनेको कहतें हैं;क्योंकि वह सर्वप्रकाश(ज्ञान)का देवता हैं। आदित्यको सम्बोधित कर आचार्य कहतें हैं-"हे सविता देव!अब यह बटु आपका ब्रह्मचारी हैं, आप इसका रक्षण कीजियेगा। इस क्रियाके बाद बटु अग्नि आदि दैवताओंसे बुद्धि,बल इत्यादि सद्गुणोंकी याचना करता हैं। तत्पश्चात् आचार्य बटुके हृदयपर अपना दाहिना हाथ रखकर कहतें हैं कि मैं जो सदाचारव्रतका पालन करता हूं,उसमें तेरा हृदय हो(तेरा अनुसरण हो)। मेरे चित्तका अनुसरण तेरा चित्त करता रहै। मेरी वाणी-जैसी तेरी वाणी हो। विद्याके देव बृहस्पति तुझे मेरेसे युक्त करवायें। इसके बाद बटु गुरुगृहमें विद्यापूर्तिपर्यन्त रहता हैं। बटु वेदविद्या तथा धर्मका ज्ञान सम्पादनकर ब्रह्मचर्याश्रमको पूरा करके गुरुसे आज्ञा लेकर अपने घर वापस आता हैं और माता-पिताकी आज्ञाके अनुसार वह "केशान्त और समावर्तन-संस्कारद्वय से संस्कृत हो कर सविधि विवाह-संस्कारसे गृहस्थाश्रममें प्रवेश करता हैं। "वेदाभ्यासो हि विप्राणां परमं तप उच्यते। ब्रह्मयज्ञः स विज्ञेयः षडङ्गसहितस्तु सः।।दक्षस्मृतिः२५-२६।। ब्राह्मणोंके लिये षडङ्गसहित वेदशास्त्रका अभ्यास ब्रह्मयज्ञके समान हैं और वही श्रेष्ठ तप हैं।
वर्तमानके"समुह यज्ञोपवीत-संस्कारमें गायत्री- उपदेश अधिकार प्राप्त करने न तो कोई आचार्यका अनुष्ठान होता हैं। न तो स्वयं निर्मित यज्ञोपवीत पहनायी जातीं हैं। न तो कालातिक्रम संस्कारों के प्रायश्चित्त की सावधानी। न तो नेतृत्वके अधिकार व बटुके उपनयन-संस्कारसे पहले के खाने-पीने तथा अकृतकर्मोंका प्रायश्चित्तकी सावधानी। न तो ढंगसे प्रत्येक बटुको आचार्य संस्कार दे सकतें हैं । हद तो यह हैं कि बटुकी उम्र जब विवाह करने लायक हों तब समुहमें यज्ञोपवीत करवाँकर फरज से हाथ धो लेतें हैं(बाजखेडावाळ ब्राह्मण-गुजरातमें तो विवाहके अगले दिन कोई कोई आचार्य यज्ञोपवीत-संस्कार करनेकी सम्मति दे दैंते हैं और करवाँ भी देतें हैं यह शास्त्रमान्य समय ही नहीं इसलिये निरर्थक हैं ऐसे युवकको पतितसावित्रिक दोष लग जाता हैं।"विवाहयोग्यको यज्ञोपवीत देनेसे पहले प्रायश्चित्त करकें यज्ञोपवीत देकर व्यवहार कीया जाता हैं। सही समयपर माता-पिताकी आँख नहीं खुलती। यह समुह यज्ञोपवीत-संस्कार! कुछ पैसे बचाने के लिये तो ठीक हैं परंतु यज्ञोपवीतके साङ्गोपाङ्ग विधानके लिये अधम हैं,और निरर्थक भी ऐसे कईं माता-पिता और आचार्यके कर्मवैकल्य दोष रह जातें हैं। ध्यान रहैं कि यह संस्कार बटु का हैं आमंत्रित किये जाने वालें महेमानोंका नहीं । केवल पैसे बचाने के लिये यह संस्कार समुहमें न करवाँकर विधानसे स्वकिय फर्ज समज़कर करैं। ज्यादा महेमानोंको आमंत्रण देनी की आवश्यकता नहीं हैं।
ॐस्वस्ति।। पु ह शास्त्री.उमरेठ।। शेष
यज्ञोपवीत-वेदारंभ संस्कार विधान पुनः
षोडश-संस्काराः खंड १२३-(यज्ञोपवीतम्)वर्तमान समयपर यज्ञादि कार्यों में वैदिक कर्माधिकार प्राप्तकरवाने के लिये कोई कोई आचार्य पहलेसे जनेऊसंस्कार सम्पन्न यज्ञोपवीतरहित यजमानको तात्कालिक यज्ञोपवीत पहना देतें हैं,यह बिना प्रायश्चित्त किये ऐसे पहलेसे जनेऊसंस्कार सम्पन्न यजमानको जनेऊ पहनादेना यह शास्त्रसम्मत विधान नहीं हैं।क्योंकि-"विना यज्ञोपवीतेन विण्मूत्रोत्सर्गकृद्यदि। उपवास द्वयं कृत्वा दानै र्होमैस्तु शुद्ध्यति।।संग्रहे।। अर्थात् पहलेसे जनेऊसंस्कार सम्पन्न द्विज यज्ञोपवीतके बिना यदि मल मूत्र त्याग करैं तो दो उपवास करकें दान (गायत्रीमंत्र)होमसे प्रायश्चित्त करकें शुद्ध होता हैं।"ब्रह्मसूत्रं विना भुंक्ते विण्मूत्रं कुरूते$थ वा। गायत्र्यष्टसहस्रेण प्राणायामेन शुद्ध्यति।।मरिचिः।। मरिचिके वचनसे यज्ञोपवीतके बिना भोजनकरने,या मल-मूत्र त्याग करनेपर आठहजार गायत्रीमंत्र जप का प्रायश्चित्त करैं तथा प्राणायाम करने से शुद्धि होती हैं।"विना यज्ञोपवीतेन तोयं यः पिबते द्विज उपवासेन चैकेन पञ्चगव्येन शुद्ध्यति।।" और पानी पीनेका प्रायश्चित्त एक उपवास तथा पञ्चगव्य प्राशन करनेसे शुद्धि होती हैं।"यज्ञोपवीतहीनः क्षणं तिष्ठेच्चेच्छतगायत्री जपः"एक क्षणभी यदि बिना यज्ञोपवीत रहे तो १००गायत्रीजप करैं। मणीबन्धसे नीचे सिरकजायें तो तीन या छह प्राणायाम करैं।इन सब प्रायश्चित्त लौकिक(बिनामंत्रसे)जनेऊ धारण करकें करैं। यह नियम तात्कालिक ध्यानमें आनेपर एक ही दिनकी अवधीका हैं।परंतु यज्ञोपवीतके बिना अधिक दिन निकल जानें पर पुनः यज्ञोपवीत संस्कार करैं।"कठाःकाण्वाश्च चरका विप्रावाजसनेयकाः। बह्वृचाः सामगाश्चैव ये चान्ये यजुशाखिनः।। कण्ठादुत्तार्य सूत्रं तु पुनः संस्कार महर्ति।। आह्निक सूत्रे।।"कृष्णयजुर्वेदकी-कठ,चरक, तथा शुक्लयजुर्वेद- वाजसनेयीकी-माध्यंदीनी और काण्व, ऋग्वेदियों तथा सामवेदियों और भी जो यजुर्वेदकी शाखायें वाले हो!इनको कण्ठ(शिरोमार्ग)से जनेऊ त्याग करनेपर पुनः यज्ञोपवीत के लायक हैं|
प्रायश्चित कें होम तथा पुनः यज्ञोपवीत विधान समय रहते बतायेंगे।
ॐस्वस्ति।।पु ह शास्त्री.उमरेठ।।शेष पुनः
षोडश संस्काराः खंड १२५ (यज्ञोपवीतवेदारम्भौ)-
उपनयन हो जानेपर बालकका वेदाध्ययनमें अधिकार प्राप्त हो जाता हैं|"(उपनीय गुरुः शिष्यं महाव्याहृति पूर्वकम् | वेदमध्यापयेदेनं शौचाचाराँश्च शिक्षयेत्||)" गुरु अपने शिष्यको उपनयन करनेके बाद महाव्याहृतिके उच्चारपूर्वक वेदाभ्यास करायैं।और शौचाचारका शिक्षण दैं। विद् -ज्ञाने धातुसे निष्पन्न वेद शब्दका अर्थ ही हैं ज्ञान| बिना ज्ञान जीवनकी यात्रा को सहज नहीं बनाया जा सकता | अतः इस संस्कारद्वारा जीवनयात्राको निरापद बनानेका उपक्रम किया जाता हैं |
अपने कुलकी परम्परासे जो वेद शाखा प्राप्त हुए हो! उस वेद शाखाका ही पहले अध्ययन और कर्म करैं,तथा अपनी वेद शाखाका अध्ययन समाप्तिके बाद ही दूसरे वेद शाखाका क्रमसे अध्ययन करैं।"(अधीत्य शाखामात्मीयामन्यशाखां ततः पठेत् | स्व शाखां यः परित्यज्य शाखारण्डः स उच्यते ||वशिष्ठ||)"जो विप्र अपनी वेद शाखा का त्यागकर दूसरे शाखाका कर्म करता हैं उनको धर्मवेताओंने "शाखारण्ड" की कनिष्ठ उपमा दी हैं| इसलिये अपनी कुलपरम्परासे जो वेद शाखा प्रचलित हो उनका ही अध्ययन करना तथा कर्मभी अपनी शाखाका ही करैं|
इस वेदाध्ययनमें वेदाभ्यास समाप्ति तक अखंड ब्रह्मचर्यका पालन करतें हुए परमात्मापथ में अग्रसर होनेके लिये अपने पुरुषार्थ(नियम-संयम)की प्रतिज्ञा करता हैं-इस कार्यके लिये बटुकको (१)ब्रह्मचर्यपालन (२)गुरुसेवा(शुश्रूषा)प्रमुख होतें हैं | सनत्सुजातीयमें गुरुसेवाके चार पाद कहे गये हैं-
क-"(शिष्यवृत्तिक्रमेणैव विद्यामाप्नोति यः शुचिः | ब्रह्मचर्यव्रतस्यास्य प्रथमः पाद उच्यते ||)" भीतर बाहरकी शुचिताका अवलम्बन कर शिष्यवृत्तिद्वारा आचार्य से जो विद्यार्जन किया जाता है,वही ब्रह्मचर्यव्रतका प्रथम पाद हैं |
ख-"(यथा नित्यं गुरौ वृत्तिर्गुरुपत्न्यां तथाऽऽचरेत् | तत्पुत्रे च तथा कुर्वन् द्वितीयः पाद उच्यते ||)" गुरुके समान ही गुरुपत्नी एवं गुरुपत्नीमें भी सद्वृत्ति(सदाचार)का पालन करना[ब्रह्मचर्य व्रतका]का द्वितीय पाद हैं |
ग-"(आचार्येणात्मकृतं विजानन् ज्ञात्वा चार्थे भावितोऽस्मीत्यनेन | यन्मन्यते तं प्रति हृष्टबुद्धिः स वै तृतीयो ब्रह्मचर्यस्य पादः ||)" आचार्यद्वारा अपने प्रति उपकारको समझकर एवं उनके द्वारा प्राप्त वेदज्ञानसे अपनेको सम्भावित(सम्मानित)समझकर हृदयमें उत्पन्न हर्ष,प्रसन्नता और कृतघ्नता-(का मूलभाव)ही ब्रह्मचर्य व्रतका तृतीय पाद हैं|
घ-"(आचार्याय प्रियं कुर्यात् प्राणैरपि धनैरपि | कर्मणा मनसा वाचा चतुर्थः पाद उच्यते ||)" प्राण,धन,मन,वाणी,एवं सत्कर्मके द्वारा आचार्यका प्रिय(आदर-सन्मान),हित करना ही[ब्रह्मचर्य व्रत]का चतुर्थ पाद हैं |
"(विद्यया लुप्यते पापं विद्ययाऽऽयुः प्रवर्धते | विद्यया सर्वसिद्धिः स्याद्विद्ययाऽमृतमश्नुते||)" वेदविद्याके अद्ययनसे सारें पापोंका लोप होता हैं,आयुकी वृद्धि होती हैं,सारी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं,यहाँतक कि उसके समक्ष साक्षात् अमृतरस अशन-पानके रूपमें उपलब्ध हो जाता हैं | तत्त्वज्ञान की प्राप्ति कराना ही इस संस्कारका परम प्रयोजन हैं | वेदव्रत नामक संस्कारमें "महानाम्नि", महान्", उपनिषद् एवं उपाकर्म चार व्रत आतें हैं | उपाकर्मको सभी जानतें हैं| यह प्रतिवर्ष वर्षाऋतुमें होता हैं| शेष प्रथम महानाम्नीमें प्रतिवर्षान्त सामवेदके महानाम्नी आर्चिककी नौ ऋचाओंका पाठ होता हैं | प्रथम मुख्य ऋचा इस प्रकार हैं-" (विदा मघवन् विदा गातुमनुश गूँ सिषो दिशः | शिक्षा शचीनां पते पूर्वीणां पुरूवसो ||साम०६४१|| इसका भाव हैं-"अत्यन्त वैभवशाली,उदार एवं पूज्य परमात्मन् !आप सम्पूर्ण वेद-विद्याओंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं एवं आप सन्मार्ग और गम्य दिशाओंको भी ठीक-ठीक जानतें हैं, हे आदिशक्तिके स्वामिन्! आप हमें शिक्षाका साङ्गोपाङ्ग रहस्य बतला दैं | द्वितीय तथा तृतीय वर्षोंमें क्रमशः वैदिक-महाव्रत" तथा उपनिषद्-व्रत" किया जाता हैं, जिसमें वेदोंकी ऋचाओं तथा उपनिषदोंका श्रद्धापूर्वक पाठ किया जाता हैं और अन्तमें सावित्री स्नान होता हैं| इसके अनन्तर वेदाध्यायी स्नातक कहलाता हैं| इसमें सभी मन्त्र संहिताओंका गुरुमुखसे श्रवण तथा मनन करना होता हैं| यह वेदारम्भ मुख्यतः ब्रह्मचर्याश्रम-संस्कार हैं|
ॐस्वस्ति।।पु ह शास्त्री.उमरेठ।।शेष पुनः
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Thank You for read || jay maa samudri ||