अथ कंडोलब्राह्मणोत्पत्तिप्रकरणम् (१)

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥   

।। स्कंदमहापुराणे।।  ।।स्कंद उवाच।।  कंडूलस्थानपर्वस्य माहात्म्यं वद शंकर केन तत्स्थापि स्थानं विप्राश्च वणिजः कति ॥१ ॥


किं तत्प्रमाणमापन्न ब्रूहि विस्तरतोऽखिलम्॥ ईश्वर उवाच ॥साधु पृष्ट महाभाग सर्वपापप्रणोदकृत् ॥ २ ॥


आख्यानमिदमेतस्य स्थानस्य सर्वकामदम्  शृणुष्वैकमना वत्स समासात्ते वदाम्यहम् ।।॥ ३ ॥ 


स्थापित कण्वमुनिना मांधात्रा पालितं कृते । दौत्ये हनुमता तत्र सूर्ये साक्ष्यमुपागते ॥ ४ ॥


पुरा कृतयुगे तात देशे पाञ्चालसंज्ञके ॥वनं पापापनोदाख्यं महर्षिगण सेवितम् ।।५।।


तत्र कश्चिद्रनचरो व्याधो वै जीवहिंसकः ॥ वसन्कालो गत स्तस्य महांस्तेनैव कर्मणा ॥ ६ ॥ 


ब्रह्मर्षीन पंच सोऽपश्य न्मन्यमानो मृगांश्च तान् ॥ ध्यायतः परमं ब्रह्म समाधिस्थां स्तपोधनान् || ७ || तथापि शीत बाहुल्याकंपमानान्विशेषतः॥ 


अब कंडोल और कपोल वनिये और सौरठवनियों की उत्पत्ति कहते हैं  स्कंद पूछतेहैं हे शिव ! कंडूल जो स्थान है उसका माहात्म्य मुझको कहो वह स्थान किसने स्थापन किया । और वहां ब्राह्मणवानिये कितने हैं ॥ १ ॥

 उनका क्या प्रमाण है । सो सब कहो शिव कहनेलगे हे स्कंद ! तुमने प्रश्न अच्छा किया ॥ २ ॥ 

इस स्थानका आख्यान मैं कहता हूँ एक मनसे श्रवण करो ॥ ३ ॥

 पहिले सत्ययुगमें क सुनिने स्थापनाकिया और मांधाताने पालन किया । हनूमानने जहां दूतत्व किया है । सूर्य साक्षीमें आये हैं ॥४ ॥

 हे स्कंद ! सत्ययुगमें पांचालदेशमें पापापनोदन नामका एक वन ऋषिगणसेवित था ॥५ ॥ 

वहां एक भिल्ल रहताथा प्राणियोंकी हिंसा करते करते बहुत काल गया ॥ ६ ॥

एक समय में उस वनमें पांच ऋषीश्वर ब्रह्मध्यान करतेहुवे समाधिस्थ बैठे थे।।७॥ 

तथापि अतिठंडसे कंपायमान जिनकाशरीर हो रहा है ऐसे देखके दूसरे मृग बैठे हैं ऐसा जानके शिकार के लिये वहां आया जो परमपापी जड था


(क्रमशः) संकलन- हर्ष अध्वर्यु