अथ कंडोलब्राह्मणोत्पत्तिप्रकरणम् ( २ )

तान् दृष्ट्वा मृगयुः पापः परितोऽपि जडार्दितः ॥ ८ ॥

पूतस्त दर्शनादेव पापिष्ठोप्यभवत्तदा ॥ एते महर्षयः पंच तप्यमाना महत्तपः॥९॥

दृश्यंते कायकपेन शीतार्ता इति मे मतिः एवं विचार्य पूतात्माकाष्ठमध्याधुताशनम् ॥ १० ॥

उत्पाद्य ज्वालयामासतापयामासतान्मुनीन् शीतेन मुक्ता मुनयो ह्यपश्यन् लुब्धकं पुरः ॥ ११ ॥

दयापूर्णास्ततो व्याधमूचुर्भो व्याध हिंसक कथमासी यापूर्ण : शीतातेंषु तपस्विषु ॥ ॥ १२ ॥

सोप्याह मुनिशार्दूला युष्मदर्शनयोगतः। निर्मला बुद्धिरुत्पन्ना सर्वभूतानुकंपनम् ॥१३ ॥

जातं परं तु भो विश्रा जन्मारभ्य मया महत् । पातकं वै कृतं घोरं तत्रैषां दर्शनंकुतः ॥ १४॥

प्राप्त केन विपाकेन ब्रुवतु मे तपोधनाः। ऋषय ऊचुः शृणुष्वैकमना व्याध तव जन्म पुरातनम् ॥ १५ ॥

पुरा त्वमभवद्वैश्यः कटुकेति सुविश्रुतः। धनवानपि तेदान न दत्तं कर्हि चिदिने ॥१६॥

कदाचिदैवयोगेन नारदो ह्यागत स्तव गृहे तदा त्वया तस्य महापूजा कृता किल ॥ १७ ॥

कालाष्टमीव्रतं चक्रे नारदस्योपदेशतः। व्रतांते मृतिमापनो व्याधजन्म समीयिवान् ॥१८ ॥



परंतु उनके दर्शन करतेही पवित्र होगया और विचार करनलेगा ये बडे ऋषीश्वर हैं तप करते ॥ ९ ॥

बहुत ठंढीसे इनका देह कंपित होताहै ऐसा विचार करके काष्ठके अंदरसे अभिकूं ॥ १० ॥

उत्पन्न करके प्रदीप्त करके उन ऋषियों तपाने लगा । तब वे सब ऋषि शीतसे मुक्त होके सामने उस भिल्लकूं देखके ॥११॥

कृपापूर्ण होयके कहते हैं हे भिल ! तू हिंसक होयके शीतार्त तपस्वीके ऊपर दयापूर्ण कैसेभया ॥ १२ ॥

तब वह कहनेलगा कि आपके दर्शन करने से मुझको निर्मल बुद्धि उत्पन्नभई और सबके ऊपर दयाभई ॥ १३ ॥

परंतु हे ऋषीश्वरो ! जन्मसे लेके आज तक मैंने बहुत पाप किया उसमें तुम्हारा दर्शन मुझको कहांसे ॥ १४ ॥

कौनसे पुण्य के योगसे भया सो को ऋषि कहलगे हे भिल्ल ! तेरे पूर्वजन्मकी कथा कहतेहैं ॥ ॥ १५ ॥

श्रवणकर पहले कटुकनाम करके तू वैश्य था । धनवान् था परंतु कभी तूने दानधर्म किया नहीं ॥ १६ ॥

किसी समय दैवयोग से नारदऋषी तेरे घर आये । तब उनकी बडी पूजा करी और नारदजीके उपदेशसे ॥ १७ ॥

कालाष्टमीका व्रत किया व्रतकी पूर्णता भये बाद तेरा मृत्यु भया । पीछे भिल्लके जन्मभे आया ।। १८ ।।



क्रमशः संकलन - हर्ष अध्वर्यु