अथ कंडोलब्राह्मणोत्पत्तिप्रकरणम् ( ५ )

पूर्वजन्मकृताभ्यासात्प्राणिद्रोहो भृतो मया। अज्ञानात्पीडिता विप्रास्तत्क्षमध्वं द्विजोत्तमाः॥ ३८ ॥ 

कण्व उवाच ॥ धन्योऽसि नृपशार्दूल मतिस्तेयदकल्मषा | एनोहानि विनाभ्रूप न भवेन्मतिरीहशी ॥३ ९ ॥

 राज्यपालय भूपाल राजयोगंसमाश्रितः | आत्मानंसर्वभूतेषु पश्यव्याप्तोनुकंपया ॥ ४० ॥

एवं न लिप्यते भूपकर्मणा केनचिक्वचित् ॥ मांधातोवाच ॥ भवत्प्रसादतः पृथ्वीं पालयिष्यामि सुव्रत ॥ ४१ ॥ 

तदादिशत वोऽभीष्टं किं करोमीह किंकरः।एवं नृपवचः श्रुत्वा प्रहृष्टः कण्व अब्रवीत्॥ ॥ ४२ ॥ 

एवं प्रवर्तते चित्ते तव राजन्महामते । स्थानकर्तात्र विप्राणामहंतत्पालय प्रभो।। ॥४३॥ 

शालातालनिवेशाढचं वणिग्वाडवमंडितम् स्थापयामिद्विजस्थानंसूर्यसाक्षिकमुपात्तमम् ।।  ।। ४४

।। तावत्तिष्ठमहाराज समीपंसमुपागतम्  यावदत्र महास्थानं स्थापयामिद्विजन्मनाम् ॥ ४५ ॥

ततः संचित्यमनसा सहस्रकिरण मुनिः। तुष्टा व च ततः सूर्यः प्रादुरासीदुवाच ह ।। ४६ ॥

हे मुनि आप के अनुग्रह से मेरेकूं क्या प्राप्त नहीं हुआ!, किंतु सर्व प्राप्त हुआ है ब्राह्मणसरीखा दूसरा पवित्र तीर्थ ही नहीं है ॥ ३७॥

पूर्वजन्म के अभ्यास से मैंने प्राणिद्रोह किया और अज्ञानतासे ब्राह्मणोंको पीडित किया वह अपराध क्षमा करो ॥ ३८ ॥

कण्व कहने लगे हे राजा ! तू धन्यहै , तेरी निर्मल बुद्धि भई , निष्पाप हुवे बिना ऐसी बुद्धि होती नहीं ॥३ ९ ॥

हे राजा ! राजयोगसह वर्तमान राज्यका पालनकरो और सर्वभूत प्राणि मात्र में आत्मस्वरूप एक है । ऐसाजान के दयारखो। ॥ ४० ॥

ऐसे मार्गसे चलोगे तो किसी भी कर्म से लिप्त होने के नहीं, मांधाता कहनेलगे ।हे ऋषि ! आपके अनुग्रहसे पृथ्वी का पालन करूंगा ॥४१॥

और तुम्हारी जो इच्छा होवे सो कहो । यहाँक्या करूं में आपका सेवक हूं । ऐसा राजाका वचन सुनते कण्व बोले ॥ ४२ ॥

हे राजा ! जो तेरे चित्तमें ऐसा है तो मैं ब्राह्मणोंका स्थापन करताहूं तुम उनका पालन करो ॥ ४३ ॥

शालादिकोंसे शोभायमान ब्राह्मण बनियोंसे सुशोभित पवित्र स्थान का स्थापन करता हूं ॥ ४४ ।।

तावत्कालपर्यंत तुम मेरे समीप रहो।।। ४५।।

मन से श्री सूर्य देवताका चिंतन करतेही सूर्यदेवता प्रकट होके कहनेलगे ॥ ४६॥

क्रमशः

( संकलन - हर्ष अध्वर्यु )