अथ कंडोलब्राह्मणोत्पत्तिप्रकरणम् ( ६ )
महर्षे कण्व यच्चित्त तव तद्वद सांप्रतम्। दास्यामि दुर्लभमपि वरं वरय सुव्रत।। ॥४७ ॥
कण्व उवाच।
यदि प्रसन्नो भगवन्निहक्षेत्रे समागतः। वसाजस्रं रवेविप्रवणिजःस्थापयाम्यहम् ।। ॥४८ ॥
सूर्य उवाच ।
स्थापय स्थानमतुलं वणिग्वाल संकुलम्। शालातालनिवेशाढचं साक्षीरक्षाम्यहं सदा।। ॥४ ९ ॥
त्वया स्तुतो बलादस्मात्प्रादुर्भूतो स्मि यन्मुने। बकुलार्क इति ख्यातो भविष्यामि महीतले ॥ ५० ॥इत्युकां तर्दधे तत्र भगवान्सगभस्तिमान्। महर्षिरपि सदध्यौ स्थानस्थापनहेतवे।। ।।५१ ॥
कति ब्रह्मविदो विप्रान् स्थापयामि समाहितः। शुश्रूषार्थं द्विजानांतु स्थापयेद्वणिजः कति।। ॥ ५२ ॥
कति सीमातिशोभादचं पवित्रस्थानमुत्तमम् ॥ कथं लोकेषु रचियामि विरंचिवत्।। ।।५३ ।।
एवं चिन्तयतस्तस्य महर्षेभवितात्मनः। प्रादुर्बभूव सहसा हनुमान् वानरेश्वरः।। ॥ ५४ ॥
तं विलोक्य महाकाय विस्मितो मुनिरब्रवीत्। कस्त्वं महाकपे कस्य तनयोऽति बलोत्कटः।। ॥ ५५ ॥
देवताका चिंतन करतेही सूर्यदेवता प्रकट होके कहनेलगे ॥ ४६॥
हे कण्व ! तुम्हारे चित्त में क्या है सो कहो, जो दुर्लभ वरदान माँगना दोय सो माँगो मैं देता हूँ।। ॥४७ ॥
कण्व बोले हे सूर्य ! जो प्रसन्न भये हो तो क्षेत्रमें वास करो यहां ब्राह्मण बनियोंकूं स्थापन करता हूं ।। ४८ ॥
सूर्य कहनेलगे हे ऋषियो ! स्थान निर्माण करो मैं साक्षी होयके सर्वकाल रक्षा करूंगा।। ॥ ४ ९ ॥
हे मुने ! आप ने मेरी स्तुति की उसके लिये मैं प्रकटहुवा इसवास्ते पृथ्वी में बकुलार्क नामसे विख्यात होऊंगा।। ॥ ५० ॥
ऐसा कहके सूर्य अंतर्धान हो गए, पीछे कण्वऋषि स्थानके निमित्त ध्यान करते है ।। ५१ ।।
कहनेलगे ब्राह्मण कितने स्थापन करूं ब्राह्मणों की सेवा करने के वास्ते बनिये कितने स्थापन करू ॥५२ ॥
पुरकी सीमा कितनी रखना और लोकोंमें अच्छा दोखे ऐसा किस तरह से निर्माणकरूं ॥ ५३ ||
ऐसा चिंतन करनेलगे इतनेमें श्रीहनुमान्जी प्रकट भये ॥५४ ॥
प्रचंड जिनकी काया ऐसे हनुमान् जी देखके कण्व विस्मित होके पूछने पितामहस्य वचना लगे हे बानर ! तुम कौनहो ? किसके पुत्र हो ? अति बलवान् ॥ ५५ ॥
क्रमश:
(संकलन - हर्ष अध्वर्यु)
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Thank You for read || jay maa samudri ||