विशुद्धद्विज प्रज्ञापराध से बचें।
स्वगृहे वैश्वदेवशेष सात्विकान्न का भोजन करना उचित हैं। जिसका उपनयन परम्परा से नहीं हुआ हो वे व्रात्यों का।
(१) व्रात्यान्न , यतिप्रेरित अन्न, रजस्वला- शूद्र- चांडाल, नपुंसक-बिडाल-श्वान-दृष्टि आदि से
(२)दूषितान्न, विशुद्ध उपनीतद्विज की पंक्तिबाह्य के
(३) अपांक्तेयदोषान्न, बाजारों-हॉटलों-लारीयों में बिकता -विक्रय कारण से बना पका हुआ अन्न
(४)क्रीतान्नदोष , जिसका उपनयन हुआ हो वे गृहस्थद्विज यदि नित्यसन्ध्योपासना,देवपूजा,पंचयज्ञात्मक-वैश्वदेव नहीं करतें -
(५)कर्मसांकर्यदोषान्न, पुनरुपनयन निमित्तक द्विजबाह्य होने का द्विजत्वनाशक जो निषेध हैं उनका पालन न करनेवालों का अन्न -
(६) पतितान्न - आदि के कोटी में हैं - यह सब नित्यकर्मप्रवृत्त विशुद्धद्विजों को नहीं खाना चाहिये भले ही अपने सम्बन्धि भी क्यों न हो । यह निष्पक्ष और शास्त्रप्रमाणित न्याय हैं। भूल से खा भी लिया तो यथोचित प्रायश्चित्त से शुद्धि अनिवार्य हैं।
हमारी आपकी सबकी अादिकाल से चली आ रही शास्त्रशुद्धाचार की परम्परा ब्राह्मणादि द्विजों के विधिवत् क्रम से अध्ययनाध्यापन का क्रम बुद्धिपूर्वक म्लेच्छों की झपैट में आकर बचा नहीं पाने के कारण । जिस परम्परा के संवाहक हमारे पितरों भी स्वधर्म से पालन कर चूकें थें वह हमें - आज वही शास्त्रप्रतिपाद्य मूलकारणों को प्रकट करने के लिये जब कोई विशुद्धब्राह्मण ! जनता को अपने अपने अधिकार के धर्माचरण कहें तब भी परम्परा टुटने के कारण नया लगने लगता हैं बस इतना ही अंतर हैं। महाभारत उद्योगपर्व में कहा हैं कि -- स्वधर्म का पालन करतें हुए पुण्य करता रहता हैं वह एक नये पुण्यकार्य(शिष्टाचार)को आचरने में प्रतिशिष्टाचार से उत्साहित होता रहता हैं और यह सोचने लगता हैं कि और ज्यादा शिष्ट बनूँ। और पापरत लोगों की विवेकशील-बुद्धि अनेक-पापों से आवृत्ता होने के कारण नाश होती हैं और विवेकशील-बुद्धि जिसकी नाश होती हैं वह पाप पर पाप करतें ही रहता हैं। अतः निर्णय आपके हाथ में हैं कि पापप्रवृत्ति में रत बनना हैं कि पुण्यकर्मकर्मों की वृद्धि करकें सभी को एक शिष्टाचारका प्रमाण देना हैं ।
साभार शास्त्री पुलकित
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Thank You for read || jay maa samudri ||