अथ कंडोलब्राह्मणोत्पत्तिप्रकरणम् ( १२ )
अहं धन्योऽस्मि सुतप छात्ररत्नं यतो भवान्। वरं वरय तुष्टोऽस्मिकर्मणा नैव सुव्रत ॥ १०२ ॥
गालव उवाच ॥भवत्प्रसादतो विप्रा वणिजश्वसमागताः | तत्स्थानं स्थापय ब्रह्ममुहूर्तेऽस्मिञ्छुभमहे ॥ १०३ ॥
परं तुष्टोऽसि वणिजां षट्सहस्रं प्रदीयताम् ॥ त्वत्स्थानस्थाप नामध्ये स्थापयिष्यामि तानहम् ॥ १०४ ॥
मन्नाम्नाख्या तिमायांतु त्वत्प्रसादान्महामुने ॥ तथेत्युक्त्वा शुभे लग्ने स्थापयामास वाडवान् ॥ १०५ ॥
अष्टादशसहस्राणि कण्वो बुद्धिमतां वरः। शुश्रूषार्थ द्विजेंद्राणां समर्थानर्थपूर्तये ॥ ।।१०६ ॥
त्रिंशत्संख्यासहस्राणि वणिजः स्थापयत्तथा ॥ तथेत्युक्त्वाथ सस्मार विश्वकर्माणमाशु सः ॥ १०७ ॥
स्थापयिष्येमहास्थानवणिग्विप्रैर्विराजितम्। तदर्थमन्त्र विपिने प्रासादान्कुरु संमतान् ॥ १०८ ॥
वरारामाभिरामं तत्पुरं रचय सुंदरम् ॥ निशम्येति वचस्तस्य कण्वस्य सुमहात्मनः ॥ १०९ ॥
निमे पान्निर्ममे स्थान विश्वकर्मा स्वचेतसा। अष्टादशसहस्राणि ब्रा ह्मणानां गृहाणि सः ॥ ११०॥
षट्त्रिंशच्च सहस्राणि वणिजां मंदिराणि च। रम्यं पुरं विनिर्माय विश्वकर्मा जगामह ॥ १११॥
गालव कहनेलगे आपके अनुग्रहसे ब्राह्मण और बनिये आये हैं इनकी स्थापना उत्तम मुहूर्तमें करो ॥ १०३ ॥
परन्तु आप जो प्रसन्न हुए हो तो छः हजार बानिये मेरे को दे तुम्हारे स्थापना किये हुवे स्थानपे में उनका स्थापन करता हूं ॥ १०४ ॥
हे गुरु तुम्हारी कृपासे मेरे नामसे वह विख्यात हो। ।।१०५।।
तथास्तु कहके शुभलग्नमें अठारह हजार ब्राह्मणोंकी स्थापना किये ब्राह्मण की शुश्रूषा करनेके वास्ते बनिये ॥ १०६ ॥
छत्तीस हजार बनिये स्थापन किए बाद विश्वकर्माका स्मरण किया ॥ १०७ ॥
विश्वकर्मा आये उनकूं कण्वऋषि कहनेलगे कि ब्राह्मण बनियोंकी स्थापना करता हूं इसवास्ते इस वनमें उत्तम प्रासाद/नगर ( घर ) बनावो ॥ १०८॥
उत्तम बाग वर्गाचे जिसमें होवें ऐसे सुन्दर पुर की रचना करो ऐसा कण्वका वचन सुनके।। ।।१०९।।
एक निमिष मात्रमें अपने तेज से विश्वकर्माने स्थान निर्माण किया अठारह हजार ब्राह्मणों के घर, यज्ञशाला,मंदिर आदि ॥ ११० ॥
छत्तीसहजार बनियोंके घर जिसमें हैं ऐसा रमणीय पुर (नगर) बाग बगीचे निर्माण करते विश्वकर्मा ( १११ )
क्रमशः
(संकलन - हर्ष अध्वर्यु )
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Thank You for read || jay maa samudri ||