अथ कंडोलब्राह्मणोत्पत्तिप्रकरणम् ( ११ )

आदिष्टवानिदं प्रीतः प्रत्येकं नः सुविस्मितान् । तीर्थयात्रामिपाद्विप्रास्तद्वय समुपागताः ॥ ९३ ॥

तदेवाशु विवृण्वंतु भवतः कांक्षित हि तत् ॥ युष्मप्रसादतः सर्व साधयिष्यामहे द्विजाः ॥ ९ ४ ॥

॥ गालव उवाच ॥ पापांपनोदनं तीर्थ देशे पाञ्चालसंज्ञके ॥ अस्ति तत्र मुनिःसाक्षा कण्वनामा महातपाः ॥९ ५ ॥

तस्यासीन्महती विप्र स्थापनेच्छा द्विजन्मनाम्। तदर्थं चिंतयानस्य हनुमान् पुरतोऽत्रवीत् ।।९ ६ ।।

सौराष्ट्र देशवसतीद्विजांश्च वणिजस्तथा। समानीय प्रयत्नेन स्थापयात्र महा मुने॥ ।।९७।।

गुरोरादेशमादाय संप्राप्तोस्मीह सांप्रतम्। तदागच्छत वः सर्वे तत्रामीभिर्द्विजैःसह ॥ ।।९ ८।।

अहोविधेर्न रचना ज्ञातुं केनापि शक्यते ॥ तदर्थसिद्धयर्थं वणिजिसमागमः ॥ ९९ ॥

गालवस्य वचः श्रुत्वा द्विजाश्चा वणिजस्तथा ॥ पापापनोदं तीर्थं वै प्रयातास्ते सगालवाः ॥ १०० ॥

अथायातान्द्रिजवणिग्जनान्गालवसंगतान्। समालोक्यात्रवीच्छिष्यं हृष्टरोमा मुनीश्वर:।। ।।१०१।।



हम सब तीर्थयात्रा के निमित्तसे यहां प्राप्त हुए हैं ॥ ९ ३ ।।

इसवास्ते आपकी जो इच्छा है वह कहो आपकी कृपासे सिद्ध करेंगे ।।९ ४ ।।

गालव कहनेलगे पांचाल देशमें पापापनोदन नामक तीर्थ है । वहां कण्व नाम से बडे ऋषीश्वर हैं।। ९ ५ ।।

उनको ब्राह्मण स्थापन करनेकी इच्छा हुई उसी बखत हनुमानजी सामने आके कहनेलगे॥९ ६ ॥

कि सौराष्ट्रदेश में जो ब्राह्मण बनिये रहते हैं उनको लाके यहां स्थापन करो।।९ ७।।

तब गुरुकी आज्ञा से यहां आया हूं इसवास्ते इन ब्राह्मणों के साथ वहां चलो ॥ ९८ ॥

अहो क्या आश्चर्य है ब्रह्माकी रचना किसीको मालूम नहीं होती हैं । गुरु का कार्य सिद्धि करने के लिये ब्राह्मण बनियोंका समागम हुआ ॥ ९ ९ ॥

गालव का वचन सुनते ब्राह्मण और बनिये गालवके साथ पापापनोदन तीर्थ में आए ॥१०० ॥

गालव सहित ब्राह्मण बनियोंको देखके प्रसन्न मन हो के कहने लगे।।१०१।।



क्रमशः

(संकलन - हर्ष अध्वर्यु )