अथ कंडोलब्राह्मणोत्पत्तिप्रकरणम् ( ५ )

किमर्थमिह संप्रातः स्वेच्छ या वा तदुच्यताम्। कपिरुवाच ॥ ब्रह्मन् केसरिणः क्षेत्रेह्यंजंन्यांमारुतादहम् ॥ ५६ ॥

समुत्पन्नोऽभिधानेन हनुमा निति विश्रुतः। मदागमनकार्य ते कथयाम्यथ तच्छृणु ॥ ॥५७ ॥

विरिंचनायथादिष्ट तथा कुरु तपोनिधे। सप्तको शक्ती सीमा चतुर्दिक्षु प्रवर्तताम् ॥५८ ॥

प्राच्यां सारंगशृंगं च प्रसिद्धाशांबुर्यपि। मात्स्यो ह्रदः प्रतीच्यां च कौबेयां तालपर्वतः ॥ ५ ९ ॥

चौलक्यो दक्षिणस्यां च तथा ब्रह्मगुहा च सा। यस्यां कृताधिवासो मां ब्रह्मा संदिष्टवानिदम ॥ ६० ॥

अतोऽष्टादशसाहस्रं स्थापयात्रद्विजन्मनाम् । षट्त्रिंशच सहस्राणि सौराष्ट्रवणिजां तथा ॥ ६१ ॥

कृते कण्वालयं नाना त्रेतायां कलुषापहम् । कापिलं द्वापरे चैतद्विद्धि कंडूलकं कलौ ॥ ६२ ॥

ब्रह्मकुंडे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा ब्रह्मगुहां पुनः। निवसन् ब्रह्मशालायां सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥ ६३ ॥

ख्याति मेष्यत्यदः स्थानं मयि दूते महामुने पितामहस्य वचना ।।६४।।



तुम यहां किस निमित्त आये हो सो कहो या स्वेच्छासे आये हो, हनुमान कहते हैं हे ऋषि ! केशरीवानरकी पत्नी जो अंजनी, वायु देवताके वीर्य से में उत्पन्न भयाहूं ॥ ५६ ॥

मेरा नाम हनुमान् है अपने आनेका कारण कहताहूं श्रवणकरो ॥ ५७ ।।

हे ऋषि ! ब्रह्माने जैसी आज्ञा दी है वैसा कर उस स्थानकी सीमा चार दिशामें मिलके सात कोसका निर्माण करो ॥ ५८ ॥

उस स्थान के पूर्वदिशामें सारंगपर्वत का शृंग और शांबनगरी है पश्चिमदिशामें मात्स्यहृद है उत्तर दिशाम तालपर्वत है ।। ५ ९ ॥

दक्षिण दिशा में चौलक्य पर्वत और ब्रह्मगुहा है जिन गुद्दामें बैठे हुवे मेरे आज्ञा कियी ॥ ६० ॥

इस बास्ते अठारह हजार ब्राह्मणोंका और छत्तीस हजार बनियोंका स्थापन करो ॥ ६१ ॥

इस स्थानके युगपरत्व करके चार नाम होवेंगे सत्ययुग में कण्वालयनाम त्रेतायुगमें कषावह नाम द्वापरयुग में कापि लनाम कलियुग में कंडूलनाम होवेगा ॥ ६२ ॥

जो मनुष्य ब्रह्मकुंडमें स्नान करके ब्रह्मगुफा कूं देखके ब्रह्मशाला में निवास करेगा तो वह संपूर्णपाप से मुक्त होबेगा ॥६३ ॥

हे ऋषि ! मेरे दूतत्व में रहने से यह स्थान विख्यातिकं पावेगा इसवास्ते ब्रह्माके बचनसे यह स्थान की स्थापना करो। ।।६४।।

क्रमश:

(संकलन - हर्ष अध्वर्यु )