अथ कंडोलब्राह्मणोत्पत्तिप्रकरणम् ( ८ )

इत्युक्त्वांतर्दधे वीरो हनुमान्सुनिरप्यथ। गालवं प्राह शिष्यं स विनयावनतं वचः ॥६५ ॥ 

कण्व उवाचगच्छ गालव सौराष्ट्रदेशीयान्वणिजो द्विजान् ॥ सत्कर्मनिरतान्धर्मनिर्मलांस्त्वं समानय ॥ ६६ ॥ 

कुलीना:शीलसंपन्ना ब्रह्मविद्याविशारदाः। ब्राह्मणा वणि जश्चापि द्विजशुश्रूषणे रताः ॥ ६७ ॥

तान्समानय विजेंद्र परीक्ष्य सूर्यवर्चसः। उत्तमं स्थानमत्रैव स्थापयिष्यामि सांप्र तम् ॥ ६८ ॥ 

ततः प्रणम्य स गुरुं गालवो हृष्टमानसः। प्रभासक्षेत्रमासाद्य ह्यपश्यदैवतं गिरिम्।। ॥ ६ ९ ॥ 

ततो गिरि मतिक्रम्यगालवोऽगात्सरस्वतीम् । तत्र स्नात्वाथ तंत्रस्थान प्रणनाम द्विजोत्तमान् ॥ ७० ॥ 

तत्सरित्सेविनो विप्रास्तंवीक्ष्य प्रणतमुनिम्। पप्रच्छुः को भवान् कस्मादागतश्चाथ सोऽब्रवीत ॥ ७१ ॥

शृण्वंतु मुनयश्चात्र यदर्थमहमागतः। भवत्प्रसादतः कार्यं गुरोरेतत्प्रसिध्यति।। ॥ ७२ ॥ 

पांचालाख्ये जनपदे पुण्ये पापापनोदके। वने वसति धर्मात्मा कण्वनामामहामुनिः।। ।। ७३ ।।

हनुमतोऽब्जदूतस्य वचनात्तस्य सुव्रतःआसीडब्धवरःसोथस्थापनेच्छाद्विजन्मनाम् ॥७४ ॥



 ऐसा कहके हनुमान् अंतर्धान भये कण्वऋषि अपना शिष्य जो गालव उसकूं बोले ।। ६५ ।।

हे गालव ! सौराष्ट्रदेश में जायके वहां रहने वाले जो स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मण और बनिये उनकूं लावो ॥ ६६ ॥ 

जो कुलीन शीलसं पन्न ब्रह्मविद्या में निपुण सूर्यसरीखे तेजस्वी ब्राह्मण और ब्राह्मणशुश्रूषामें तत्पर ऐसे बनिये उनकोभी ।।६७।।

परीक्षा करके लाओ यहां उत्तम स्थानकी प्रतिष्ठा करता हूं ॥६८ ॥ 

तब गालव ऋषि प्रसन्न होयके गुरुको नमस्कार करके प्रभासक्षेत्रमें आये और रैवताचलको देखे ॥६ ९ ॥ 

पीछे रैवताचलको छोडके आगे सरस्वती के तट ऊपर आयके स्नान करके वहां बैठ हुवे ब्राह्मणोको नमस्कार करते हुए ॥७० ॥ 

सरस्वती तटके रहनेवाले ब्राह्मण गालवऋषिकं देखके पूछने लगे आप कौन है ? कहांसे आया है ? तब गालवऋषिकहनेलगे ॥ ७ ९ ॥ 

सब ऋषि श्रवणकरो जिसवास्ते में आयाहूं तुम्हारे अनुग्रहले हमारे गुरुका कार्य सिद्ध हो ॥ ७२ ॥ 

पांचाल देशमें पापापनादन वनम धर्मात्मा कण्वनामकरके ऋषि रहते थे ॥७३ ॥ ब्रह्माके दूत जो हनुमान उसके वचन से वर प्राप्त हुआ है,ब्राह्मणों की स्थापना करने की इच्छा है

क्रमशः

( संकलन - हर्ष अध्वर्यु )