अथ कंडोलब्राह्मणोत्पत्तिप्रकरणम् ( ९ )
तदर्थ महमायातो भवतः केतु नः। ब्राह्मणा ऊचुः कल्प ग्रामा दिहायाता वयं तीर्थाभिलाषिणः ॥७५ ॥
प्रभासक्षेत्रमा लोक्य मोदोऽभून्नः परोमुने। प्रार्थयस्व मुने किंस्विद्यत्ते मनसि वांछितम् ॥ ७६ ॥
दुष्प्रापमपिदातव्यमस्माभिर्धर्मव त्सलैः। ॥ गालव उवाच ॥ यदि तुष्टा भवतो मे वरयो ग्योऽस्मि चेत्तथा ॥ ७७ ॥
मरोर्मुनयः स्थानस्थापनेच्छा गरीयसी। स्थानदानमुपादाय साधयंतु गुरोर्मतम् ॥ ।।७८ ॥
तदा कण्ववचः सर्वे गालवस्य महर्षयः। ऊचुः परस्परं प्रायः समालोक्य चिंर ततः।। ॥ ७ ९ ॥
अहो बह्मन्निदं चाये भवतां गुरुवत्सलाः।स्थानप्रतिग्रहो घोरोविशेषेणद्विजन्मनाम्।। ॥ ८० ॥
किं कुर्म उररीकृत्य त्वदर्थं मुनिसत्तम ॥ पश्चात्कर्तु न शक्येत तदस्तु तव वांछितम् ॥ ८१॥
इत्युक्तवत्सु मुनिषु वणिज: सपरिग्रहाः। तीर्थयात्रार्थमुद्दिश्य प्रभासक्षेत्रमागताः।। ।।८२।।
वर प्राप्त भया ब्राह्मणोंकी स्थापना करने की इच्छा भई है ।। ७४ ।।
उस वास्ते मैं आयाहूं आप कौन हो सो कहो ब्राह्मण कहनेलगे कल्पग्रामसे हम यहां उस तीर्थकी इच्छा करके आये ॥ ।।७५।।
सो प्रभासक्षेत्रको देखके हम सर्वो को वडा आनंद भया है, हे गालव ! तुम्हारे मनमें जो होवे सो माँगो ॥ ७६ ॥
जो दुष्प्राप्य होवेगी तथापि देवेंगे, गालव बोले जो तुम मुझसे प्रसन्न हुए हो और वर लेनेको हम योग्य हैं ॥ ७७ ॥
तो यह कार्य है कि मेरे गुरुकी इच्छा स्थानप्रतिष्ठा करनेकी बहुत है इसवास्ते स्थानका दानलेके मेरे गुरुकी इच्छा पूर्ण करो ॥७८ ॥
तब गालव के मुखसे कण्व ऋषिका अभिप्राय श्रवण करके तथा विचार करके परस्पर कहने लगे ॥ ७ ९ ॥
गालव तुमने यह बडा उग्र कर्म बताया स्थानप्रतिग्रह जो है वह ब्राह्मणों के लिए बडा दोषरूप है।।८०।।
परन्तु क्या तुम्हारे वास्ते हे गालव ! पीछे करनेकू समर्थ नहीं हैं । तथापि तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो || ८१ ||
ऐसा मुनियों कहते हैं, इतनेमें वणिक लोग जो हैं वे अपने कुटुंब सह वर्तमान तीर्थयात्राक निमित प्रभास क्षेत्र में आए।।८२।।
क्रमशः(संकलन - हर्ष अध्वर्यु )
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Thank You for read || jay maa samudri ||