अथ कंडोलब्राह्मणोत्पत्तिप्रकरणम् ( १० )

पुण्याः सौराष्ट्र देशीयाःसाधुशीला दयालवः।धृतोपवीतास्ते सर्वे दानशीला महाधनाः।। ॥ ८३ ॥

इत्येवंगालवो वीक्ष्य वणिजां विशदौजसाम्। अहोधन्यतरः कोस्ति मत्तो यद्वसुधातले।। ।।८४ ॥

द्विजैरंगीकृतं दानं वणिजश्च समागताः ॥ अथ ते वणिजः सर्वेप्रणम्योचुर्द्विजोत्तमान्।। ।। ८५ ।।

विधायास्मासु करुणां भूमि देवास्तपोधनाः।भवतु गुरवोऽस्माकं सत्कर्मफलहेतवे ॥ ८६ ।।

याच्यतांदापयिष्यामोभवद्भिरभिकांक्षितम। गालवंनोदयामासुस्तन्निशम्य द्विजोत्तमाः।। ।। ८७।।

सोऽब्रवीदथ मन्वानः कार्य सिद्धेर्विचेष्टितम्। यूयं विनयसंपन्ना द्विजशुश्रूषणे रताः ॥ ८८ ||

केऽनुकंपाईहृदयाः कुतो देशात्समागताः। वणिज ऊचुः वय सौराष्ट्रदेशीया वैष्णवा वणिजो द्विजाः ॥ ८ ९ ॥

केनापि कपिनाऽत्रैव प्रेरिता वचनाद्विधेः ॥ गत्वा प्रभास तत्रस्थान्सरस्वत्यास्तटे स्थितान्। ॥९ ० ॥

शुश्रूषध्वं द्विजान्सर्वांस्तपोनिष्ठान्महत्तमान् ॥ यदादिशंतिते विप्रास्त कर्तव्यमशकितैः ॥ ९१ ॥

आदेशोऽयं विधेरेव प्रमाणीकि यतां द्रुतम्। षट्त्रिंशचसहस्राणां वणिजांकपिसत्तमः।। ॥ ९२ ॥



वे सौराष्ट्रदेश में रहनेवाले बडे दयावंत यज्ञोपवित धारण किए हुए, दानशूर धनवंत थे ।।८३।।

ऐसे वे तेजस्वी बनियोंकू देखके गालवऋष कहते है कि इस भूमिऊपर मेरे सरीखा भाग्यवान् कौन है ॥८४ ||

ब्राह्मणोंने स्थान प्रतिग्रह स्वीकार किया । इतनेमें बनीये लोग भी आये अब बनिये ब्राह्मणों को कहने लगे ॥८५ ॥

हे ब्राह्मणोत्तमो ! सत्कर्मकी फलप्राप्ति होनेके वास्ते आप हमारे गुरु हो ।।८६।।

आपकी जो इच्छा ही वह मांगो हम देवेंगे ऐसा वनियोंका वचन सुनके वे ब्राह्मण गालव ऋषिकं प्रेरणा करते हुए ।। ८७ ॥

तब गालव ऋषि अपनी कार्यसिद्धिका प्रयोजन मानके कहा- हे वणिकलोको ! तुम सब योग्यही ब्राह्मणसेवा में तत्पर रहो ॥ ८८ ॥

और दया से तुम्हारे हृदय भीगे हैं, ऐसे तुम कौन हो किस देशसे आयेहो, बनिये कहते हैं हम सौराष्ट्रदेशमें रहते हैं वैष्णव हैं। ।। ८ ९ ।।

ब्रह्मदेव के बचनसे किसी वानर ने हमको यहां भेजा है। प्रभासक्षेत्रमें जाके सरस्वतीके तट ऊपर बैठेहुये॥९० ॥

जो महात्मा तपोनिष्ठ ब्राह्मण है सेवा करो और वे ब्राह्मण जो आज्ञा करें वह कार्य तुमलोग निःसंशय अंगीकार करना ॥ ।।९१।।

यह ब्रह्माजी का वचन है, जल्दी करो एैसे छत्तीस हजार वनियों को आज्ञा करते हुए ॥ ९ २ ॥



क्रमशः

(संकलन - हर्ष अध्वर्यु )